भोजपुरी के नाम सुनते ही अगर दिमाग में बस ठुमका, डबल मीनिंग आ फूहड़ गाना आवेला, त अब ई सोच बदले वाला बा। काहे कि ‘पुरवइया’ ले के आ रहल बा एगो नया शो—‘बात-बात में भोजपुरी’। ई शो ना त चिल्ला-चोट वाला डिबेट होई, ना खाली मनोरंजन खातिर बनावल गइल चमकदार मंच। ई कोशिश बा भोजपुरी के ओ चेहरा सामने लावे के, जवन धीरे-धीरे भीड़ में दबा दिहल गइल बा।
‘बात-बात में भोजपुरी’ में बात होई ओह सवालन पर, जवना से लोग बचत बा। भोजपुरी सिनेमा आज एह हालत में काहे पहुंचल? भाषा के नाम पर बाजार कइसे बन गइल? साहित्य लिखे वाला लोग किन हालात में आजो डटल बा? कलाकार आखिर सोचत का बा? ई शो में जवाब खोजे के कोशिश होई, बहस होई, तर्क होई आ सबसे जरूरी—सच के जगह मिलल करी।
ई मंच पर चमक-दमक से जादे अहमियत बात के होई। एहिजा कवि रही, लेखक रही, गायक रही, कलाकार रही—बाकिर सबसे ऊपर रही भोजपुरी के आत्मा। बातचीत ओइसने होई, जइसन गाँव के चउपाल पर होला। सीधी, साफ, बिना लाग-लपेट के। ना भारी शब्दन के बोझ, ना बनावटी एंकरिंग। बस भोजपुरी में भोजपुरी खातिर बात।
‘पुरवइया’ के मानना बा कि भोजपुरी खाली एगो भाषा ना ह, ई करोड़ों लोगन के भावना ह। एह भाषा में माटी के खुशबू बा, परदेस गइल बेटा के चिट्ठी बा, माई के लोरी बा आ संघर्ष के आवाज बा। बाकिर अफसोस, एही भोजपुरी के सबसे जादे गलत तरीका से पेश कइल गइल। अब समय बा कि लोग भोजपुरी के असली रंग देखो।
‘बात-बात में भोजपुरी’ ओह लोग खातिर बा, जे आजो भोजपुरी सुनके अपनापन महसूस करेला। जे चाहेला कि भाषा के सम्मान मिले। जे मनोरंजन के साथ-साथ सोचल भी पसंद करेला। जल्दिए ई शो रउआ सभे के बीच होई। त तैयार रहS, काहे कि अब बात खाली भोजपुरी में ना, ‘बात-बात में भोजपुरी’ होई।
