ईरान की सड़कों पर जो कुछ हफ्तों तक आग सुलगती रही, अब उस पर सरकार राख डालती दिख रही है। लेकिन राख के नीचे कितनी चिंगारी बची है, ये सवाल अभी कायम है।
ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दावा किया है कि हालिया विरोध प्रदर्शनों में कम से कम 5,000 लोगों की मौत हुई है। इनमें करीब 500 ईरानी सुरक्षाकर्मी भी शामिल बताए गए हैं। सरकार का आरोप है कि “आतंकवादी और सशस्त्र दंगाई” निर्दोष नागरिकों को निशाना बना रहे थे। यानी सत्ता का सीधा कहना है कि जो खून बहा, उसके पीछे बाहरी और असामाजिक ताकतें थीं।
इसी बीच सर्वोच्च नेता अली खामेनेई सामने आए और पूरे घटनाक्रम को सीधे अमेरिका और इजरायल से जोड़ दिया। एक धार्मिक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ईरान ने एक बार फिर वॉशिंगटन और तेल अवीव को मात दे दी है। खामेनेई के मुताबिक, अमेरिका की साजिश थी कि देश में अशांति फैला कर ईरान को अपने काबू में किया जाए, लेकिन यह योजना नाकाम हो गई।
खामेनेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी सीधा हमला बोला। उनका कहना था कि ट्रंप ने खुलेआम दंगाइयों का समर्थन किया, बयान दिए और यहां तक कि सैन्य मदद की बातें भी कहीं। सर्वोच्च नेता ने साफ कहा कि ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन देश के भीतर या बाहर से अस्थिरता फैलाने वालों को बख्शा भी नहीं जाएगा।
दरअसल, ये पूरा मामला 28 दिसंबर से शुरू हुआ था। पहले बात सिर्फ महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली की थी। लोग सड़कों पर उतरे, नारे लगे। लेकिन देखते ही देखते प्रदर्शन देशव्यापी आंदोलन में बदल गया। कई जगहों पर नारे सीधे मौलवी शासन के खिलाफ होने लगे। सरकार के लिए यही मोड़ सबसे खतरनाक साबित हुआ। इसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद का सबसे घातक विरोध प्रदर्शन बताया जा रहा है।
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन बाद में हिंसक हो गए, क्योंकि असामाजिक तत्व बीच में कूद पड़े। अर्ध-सरकारी तस्नीम न्यूज एजेंसी के मुताबिक, अशांति के सिलसिले में करीब 3,000 लोगों को हिरासत में लिया गया है।
अब सरकार कह रही है कि हालात काबू में हैं। मोबाइल मैसेजिंग सेवाएं फिर से चालू कर दी गई हैं। एक हफ्ते के बाद स्कूल भी दोबारा खुलने जा रहे हैं। यानी जिंदगी को “नॉर्मल” दिखाने की कोशिश तेज है।
ईरान को बाहर से भी समर्थन मिला है। लेबनान के हिजबुल्लाह ने खुलकर ईरान के साथ खड़े होने का ऐलान किया। संगठन के नेता नईम कासिम ने टीवी संबोधन में ईरान को प्रतिरोध की मजबूत ताकत बताया और अमेरिका पर दुनिया पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
वहीं दूसरी ओर, ईरान ने ग्रुप ऑफ सेवन देशों को भी आड़े हाथों लिया है। विदेश मंत्रालय ने जी-सेवन के बयानों को “दखलंदाजी” करार देते हुए कहा कि ये ईरान के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप हैं और इसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, सड़कों पर शांति लौटती दिख रही है, लेकिन सवाल ये है कि क्या नाराज़गी भी खत्म हो गई है? या फिर ईरान के भीतर कुछ ऐसा अब भी पक रहा है, जो सही वक्त का इंतजार कर रहा है।



