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परदेशी के ईद अइसने होला

फेरू आराम करे ना अइबऽ
तनी से तू सम्हरे ना अइबऽ
बताव ना पापा काहे ए साल
ईद मे अबकी घरे ना अइबऽ

गोदी मे तोहरा लोटइतीं खूब
साथे भरपेट खइतीं खूब
स्कूल के नवका कविता पढ़ी
पापा तोहके सुनइतीं खूब

बड़ी सवख बा हमरो पापा
कान्ह प अपना धरे ना अइबऽ
बताव ना पापा काहे ए साल
ईद मे अबकी घरे ना अइबऽ

कईसे हम ईद मनवनी ह

​का कही ए भाई आज, कईसे हम ईद मनवनी ह,
ईदगाह में सैकड़ों भीड़ रहल ह, बाकिर खुद के तनहा पवनी ह।

​मने-मने सकुचात रहनी ह, कईसे हाथ बढ़ाईं,
कैसे करीं मुसाफ़ा हम, केकरा से हाथ मिलाईं।
​ईद परदेसी के अइसहीं होला, मन के हम समझवनी ह,
का कही ए भाई आज, कईसे हम ईद मनवनी ह।

​फिर अउते ईदगाह से हम, माई के फोन लगवनी ह,
दुआ-सलाम भईल ह, सब ठीके बाटे बतवनी ह।
​क बजे नमाज भईल ह, कब पढ़ के अईला ह?
पूछली ह माई—"ए बाबू! का बनवला ह, का खइला ह?"

रूह से पर्दा हटाओ तो ज़रा तुम

असली चेहरा भी दिखाओ तो ज़रा तुम
रूह से पर्दा हटाओ तो ज़रा तुम

भूल जाऊँगा सितम सारे पुराने
फिर सितम ढाने को आओ तो ज़रा तुम

बेवफा वो बे-ख़बर हम से हो तो हो
पर ख़बर उसकी सुनाओ तो ज़रा तुम

बुढ़ापा एक दिन अइबे करी

बुढ़ापा एक दिन अइबे करी
बचपन गइल, जवानी आइल,
उहो एक दिन जइबे करी,
चाहे कवनो जुगत भिड़ाईं,
बुढ़ापा एक दिन अइबे करी!

केतनो दुध मलिदा खाईं,
काजु किशमिश रोज चबाईं,
खिलल देह खिलले ना रही,
एक दिन इ सूख जइबे करी,
चाहे कवनो जुगत भिड़ाईं,
बुढ़ापा एक दिन अइबे करी!

कवनो पाउडर क्रीम लगाईं,
रोज रोज मेकअप करवाईं,
ढ़ल जाई चेहरा के पानी,
एक दिन इ मुरझइबे करी,
चाहे कवनो जुगत भिड़ाई,
बुढ़ापा एक दिन अइबे करी!

आठवीं अनुसूची से

भोजपुरिया के सपना के, कब ले बहराई कुची से,
कब ले भोजपुरी बाहरे रही, आठवीं अनुसूची से!

दू लाइन भोजपुरी सुनके, रउआ तऽ अगरा गइनी,
उहों के तऽ पोलियो जइसे, दू बून दवा पिया गइनी!
उहां के तऽ डोज पियवनी, खाली वोट के रुचि से,
कब ले भोजपुरी बाहरे रही, आठवीं अनुसूची से!

जंतर मंतर बइठ के रउआ, केतना जोर लगाइब जी,
जब ले संघवा सांसद मंत्री, नेताजी के ना पाइब जी,
वोट के जब हरियरी देखिहें, नेताजी अइहें खुशी से,
कब ले भोजपुरी बाहरे रही, आठवीं अनुसूची से!

पुअरा

आसमान से हल्का बुंदाबुंदी, चौपाई बयार के संगे पुस के महीना अंतिम चरण में रहे! लगभग दस दिन से सुरुज महाराज कबहूँ कुहासा त कबहूँ बदरी से तोपाइल,धरती पर आपन नजर ना फेरले रहले! हाड़ कंपावे वाला ठंड़ी के असर नवका लोग के भी जेकर खून अभीन गरम बा, रजाई में लुकाये के मजबूर कर देला तऽ सोचीं जे पुरान हो गइल बा ओकर का हाल होई?

नटवर के माई घर के ओसारा में एगो कोना पलास्टिक के चटाई पर बिछावल दोहरा बिछावन पर बइठ के थर थर कांपत रहली! ओढ़े के तऽ उ विदेश से आइल अरबियन कामरा ओढ़ले रहली, बाकिर पुरनिया देह खातिर उहो कामरा साइत कम पड़त रहे! उ मने मन इहे सोंचते रहली कि पलानी, से खपरैल ले, फेरु जब खपरैल से छत वाला मकान भइल तबहुं जिनगी में अइसन ठंढी कबहूँ ना आइल रहे! का जाने इ हमरा उमिर के दोस बा कि सांचो एतना हाड़ कंपावे वाला ठंढी आइल बा!

पहिले के समय में गाँव आजु के जइसन ना रहे! गाँव-गाँव में जाड़ा के दिन में सभका दुअरा पर घुर,आउर बहिन महतारी खातिर आंगन में बोरसी के जरुर बेवस्था रहे! आपन छोटा मोटा काम ओरवाई के सभे घुर चाहे बोरसी के चारो ओर गोलाईं में बइठ के ठंढी भगावे! ओढ़ना के नाम पर पुरान धोती साड़ी के तहिया के, मोटका डोरा से सीयल गुदरी ही ओह समय के रजाई रहे! असली रजाई त केहुवे केहुवे के घरे रहे!

हमहुं एगो रोबोट बनवले रहनी

लरिकाईं में हमहुँ एगो, रोबोट बनवले रहनी,
ओकरे आगे हम अपना के, छोट बनवले रहनी।

आठ पहर उ राखत रहे, अपना आँखि के सोझा,
हरदम कोरा टांगि के राखे, ना बुझलस उ बोझा।

ममता छोह लुटावे अउरी, पुचकारे दुलरावे,
जब हमरा के भूख लागे, उ आपन दूध पियावे।

माई

मिलल जिनगी त रिश्ता हजार बनल,
हजारों मे एक माई के प्यार बनल।

मस्जिद से मंदिर त देव भी हजार हो,
सबसे बड़ जिनगी मे माई के प्यार हो।

जेकर अँगुरी पकड़ के देखनी जहान हो,
मतलबी दुनिया मे माई तुही महान हो।

थोड़ी हया तो होनी चाहिए आँखों में

थोड़ी हया तो होनी चाहिए आँखों में
थोड़ी तमीज़ तो होनी चाहिए बातों में

रुतबा किसका कितना है क्या करना
रास्ते तो गीले हो ही जाते हैं बरसातों में

थोड़ा लहज़ा संभाला करें तो अच्छा है
नफ़रत में घर तक जल जाते हैं बातों में

कहाँ केहु दिल में उपकार राखत बा

कहाँ केहु दिल में उपकार राखत बा
मतलब से ख़ाली सरोकार राखत बा

बस गरज ले बाटे सब रिश्ता - नाता
बेगरज कहा कौनो दरकार राखत बा

जेकरा के लोग समझत बा आपन
पीठ पीछे उहे तलवार राखत बा

अपने लोग अब पराया हो गइल

अपने लोग अब पराया हो गइल।
गांव से बरगद के सफाया हो गइल।

मेल-जोल अब धतूरा सन जहरीला भइल,
आम-अमरुद के स्वाद पुराना हो गइल।

चिउंटी के चीनी खियावे वाला लोग कहाँ गइल,
अब त आदमी, आदमी के ही निशाना हो गइल।

करिया कुकुर (भोजपुरी व्यंगात्मक लघु कहानी)

​आजकल के जमाना देख के मन भकुआ जाला। शौक के कवनो ओर-छोर नइखे रह गइल। जहाँ पहिले दुआर पर गाय-गोरु के रँभाईल सुभ मानल जात रहे, ओहिजा अब कुकुर पोसल जा रहल बा। पहिले स्वागत में कुछु लिखात रहें मेन दरवाजा के आसपास अब कुकुर से बचे के चेतावनी लिखल लउकत बा। आ तनी ओकर तवज्जो देखल जाव... कुकुर न भइल, कवनो वीआईपी (VIP) मेहमान भइल!

​हमार पड़ोसी भइया जी, जे हर बात में 'राजधानी' के रट लगावेले, ऊहो एगो करिया कुकुर ले अइलन। दाम पूछनी त अइसन गरबइलन जइसे कवनो मंगल ग्रह के प्राणी के सौदा क के आइल होखस— "अरे का बताई भयवा, 12000 के त खाली बच्चा रहे, 14000 त ओकरा दवाई-बिरोई में लाग गइल। खास पटना के शौकीन घर के नसल (Breed) ह!"

​हमहूँ तनी 'तेल' लगावे खातिर बिना मन के कह देनी— "वाह भइया! मान गइनी। कुकुर त कुकुर बा, एकदम कुचु-कुचु करिया! अइसन स्मार्ट लुक त पूरा जवार में केहु के कुकुर के नइखे। एकदम लाजवाब बा राउर ई कुकुर.. राउर पसंद के त कवनो जवाबे नइखे!"

पेयार अधूरा रह गइल (भोजपुरी विरह गीत )

याद त अइबे करी घरी-घरी,
रिश्ता उ अलगे उफान पर रहल।
नज़र लागल कवने मुदइया के रामा,
बहल नयनन नीर जइसे बरखा रहल।

पिरितिया हम तोहसे लगवले रहीं,
सखी-सहेली में चर्चा कइले रहीं।
बनबऽ तुही मोर राजा ए 'रघु',
धीरे से काने माई के बतवले रहीं।

करे के रहल लमहर बात तोहसे,
उ बात अब तक अधूरा रह गइल।
नादान मन सोचले रहल बनी कहानी,
उ बतिया भी आज अधूरा रह गइल।

फेरु बयरिया डोले लागी 

फेरु बयरिया डोले लागी !
फेरु भले अधियार गइल बा,
दुर्वह मन के भार भइल बा ;
जँहवाँ ले लउकत बाटे
करिया सगरे संसार भइल बा।
लाल किरिनिया झाँकी, कलिया-
फेरु नजरिया खोले लागी !
फेरु बयरिया डोले लागी !!

हर चेतन चुप-चाप भइल बा,
नीरवता के शाप भइल बा,
मन में कतनो पीर रहे,
ओठनि के खोलल पाप भइल बा।
फेरु चिरइया चहकी, भोरे-
फेरु कोयलिया बोले लागी !
फेरु बयरिया डोले लागी !!

रहि-रहि बड़ा याद आवे लरिकइँया

रहि-रहि बड़ा याद आवे लरिकइँया
बरखा के पानी आ कागदा के नइया!

नानी कहे कहनी एगो राजा एगो रानी
राजा के महलिया भरल रहे सोना-चानी
फुदुकि-फुदुकि नाचे गावे सोन चिरइया।

रहि -रहि बड़ा याद आवे लरिकइँया
बरखा के पानी आ कगजा के नइया!

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