भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में आज का दिन किसी मील के पत्थर से कम नहीं है. बिहार की धरती ने देश को बड़े-बड़े राजनेता दिए हैं, लेकिन यह पहली बार हो रहा है जब सूबे का कोई नेता दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने जा रहा है. बांकीपुर से पांच बार के विधायक और फिलहाल पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे नितिन नवीन आज दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन दाखिल करेंगे. यह केवल एक पद की बात नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति का राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र में एक नई और मजबूत पहचान बनाने का बड़ा मौका है.
भाजपा के गलियारों से जो खबरें छनकर आ रही हैं, उनके मुताबिक इस रेस में नितिन नवीन इकलौते व्यक्ति हैं. मतलब साफ है कि उनके निर्विरोध चुने जाने की पूरी संभावना है. अगर शाम तक कोई और परचा दाखिल नहीं होता या बाकी नामांकन अमान्य हो जाते हैं, तो उनके नाम पर मुहर लगना तय है. 20 जनवरी को इसका औपचारिक ऐलान कर दिया जाएगा, जिसके बाद वे जेपी नड्डा की जगह पूर्णकालिक अध्यक्ष के रूप में कामकाज संभाल लेंगे.
नितिन नवीन की इस ताजपोशी के साथ ही भाजपा में एक नया रिकॉर्ड भी दर्ज होने जा रहा है. 45 साल की उम्र में वे पार्टी के 11वें और अब तक के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे. दिल्ली के केंद्रीय कार्यालय में होने वाली इस प्रक्रिया के दौरान पीएम मोदी और जेपी नड्डा की मौजूदगी के कयास भी लगाए जा रहे हैं, जो यह बताता है कि आलाकमान को युवा नेतृत्व पर कितना भरोसा है. महज तीन-चार घंटे की चुनावी औपचारिकताएं आज पूरी कर ली जाएंगी और शाम तक तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाएगी.
नितिन नवीन का सियासी सफर काफी दिलचस्प रहा है. वे दिवंगत भाजपा नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के बेटे हैं और छात्र राजनीति की तपिश से निकलकर यहां तक पहुंचे हैं. बांकीपुर की जनता ने उन पर लगातार पांच बार भरोसा जताया है. दिलचस्प बात यह है कि 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद जब बिहार में एनडीए की सरकार बनी, तो उन्हें मंत्री भी बनाया गया था. लेकिन जब संगठन ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी, तो उन्होंने सत्ता के बजाय संगठन को तरजीह दी और मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.
भाजपा के इस फैसले के पीछे एक सोची-समझी रणनीति नजर आती है. अटल बिहारी वाजपेयी, अमित शाह और नितिन गडकरी जैसे दिग्गजों की विरासत को अब एक युवा कंधा मिलने जा रहा है. बिहार जैसे राजनीतिक रूप से उथल-पुथल वाले राज्य से आने वाले नेता को कमान सौंपकर भाजपा ने आने वाले चुनावों के लिए एक बड़ा संदेश दिया है. यह बदलाव न सिर्फ पार्टी के भीतर पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है, बल्कि बिहार से लेकर दिल्ली तक सत्ता की एक नई धुरी बनने की शुरुआत भी है



