किस्सा मौनी अमावस्या के शाही स्नान से शुरू हुआ, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपनी परंपरा के अनुसार पालकी में बैठकर संगम की ओर बढ़ रहे थे। मेला प्रशासन ने भीड़ और सुरक्षा का हवाला देते हुए उन्हें रोक दिया, जिसके बाद पुलिस और समर्थकों में तीखी नोकझोंक हुई। स्वामी जी का आरोप है कि पुलिस ने उनके शिष्यों और बटुकों के साथ बदसलूकी की, यहां तक कि कुछ को चोटें भी आईं। इसके विरोध में स्वामी पिछले 48 घंटों से ज्यादा समय से माघ मेले की सड़क पर ही धरने पर बैठ गए हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि जब तक प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता, वे अपने शिविर में कदम नहीं रखेंगे और फुटपाथ पर ही रहेंगे।
प्रशासन का ‘सुप्रीम’ नोटिस और स्वामी का पलटवार
विवाद तब और गहरा गया जब मेला प्राधिकरण ने सोमवार रात स्वामी के शिविर के बाहर एक नोटिस चस्पा कर दिया। इस नोटिस में 14 अक्टूबर 2022 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया गया है, जिसमें ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद पर किसी के आधिकारिक पट्टाभिषेक (Coronation) पर रोक लगाई गई थी। प्रशासन ने सीधे सवाल दागा कि जब कोर्ट ने पद को रिक्त माना है, तो आप ‘शंकराचार्य’ की पदवी का इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं? इस पर स्वामी ने कड़ा जवाब देते हुए कहा कि शंकराचार्य कौन होगा, यह सरकार या राष्ट्रपति तय नहीं करते, बल्कि यह गुरु-शिष्य परंपरा का विषय है। उन्होंने दावा किया कि चार में से तीन पीठों के शंकराचार्य उन्हें मान्यता दे चुके हैं और 1954 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार सरकार मठों के संचालन में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
विपक्ष का तीखा हमला: ‘कागज दिखाओ’ पर सियासत
इस मुद्दे ने विपक्षी पार्टियों को सरकार को घेरने का सुनहरा मौका दे दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने इसे घमंड की पराकाष्ठा बताते हुए कहा कि जो लोग कल तक मुसलमानों से कागज मांगते थे, आज वही हिंदुओं के सबसे बड़े संतों से प्रमाण पत्र मांग रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चूंकि स्वामी जी ने राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा, गौ मांस और मेले की अव्यवस्था पर सवाल उठाए थे, इसलिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इसे घोर निंदनीय बताते हुए कहा कि जो लोग दूसरों से डिग्री मांगते हैं, वे अब संतों का अपमान कर रहे हैं। उन्होंने भाजपा पर ‘सत्ता और धन’ का सगा होने का आरोप लगाते हुए कहा कि अहंकार तो रावण का भी नहीं बचा था।
चुप्पी और सोशल मीडिया पर घमासान
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे बखेड़े पर यूपी सरकार और केंद्र के बड़े नेताओं ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। हालांकि, यूपी के मंत्री अनिल राजभर और कपिल देव अग्रवाल ने प्रशासन के कदम को जन सुरक्षा के लिए उठाया गया जरूरी कदम बताया है। दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग में बीजेपी समर्थक स्वामी जी पर ‘राजनीतिक एजेंडा’ चलाने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि संत समुदाय के कुछ गुटों ने स्वामी जी के साथ हुई बदसलूकी के खिलाफ वाराणसी और प्रयागराज में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। संगम की रेती पर अब धर्म, कानून और राजनीति की यह लड़ाई किस ओर मुड़ेगी, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।



