परमाणु बम की वो ‘काली बारिश’ जिसने पीढ़ियों को जख्म दिए

जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले की कहानी केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह मानव इतिहास का वह मोड़ था जिसने युद्ध की परिभाषा और दुनिया का भविष्य हमेशा के लिए बदल दिया। इस कहानी को पूरी तरह समझने के लिए हमें द्वितीय विश्व युद्ध के उन अंतिम वर्षों में जाना होगा, जब धुरी शक्तियां (Axis Powers) हार की कगार पर थीं, लेकिन जापान झुकने को तैयार नहीं था।

इस कहानी की शुरुआत युद्ध के मैदान से दूर अमेरिका की एक गुप्त प्रयोगशाला में हुई थी, जिसे ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ का नाम दिया गया था। वैज्ञानिक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर के नेतृत्व में अमेरिका एक ऐसा हथियार बना रहा था जो परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) की अपार ऊर्जा का उपयोग कर सके। अमेरिका को डर था कि अगर जर्मनी ने यह बम पहले बना लिया, तो दुनिया का अंत निश्चित है। जुलाई 1945 में न्यू मैक्सिको के रेगिस्तान में ‘ट्रिनिटी’ नामक पहला सफल परमाणु परीक्षण किया गया, जिसने दुनिया को विनाश की एक नई शक्ति से परिचित कराया।

अब सवाल यह था कि इस बम का उपयोग कहाँ किया जाए। 1945 के मध्य तक जर्मनी आत्मसमर्पण कर चुका था, लेकिन प्रशांत महासागर में जापान के साथ युद्ध अभी भी जारी था। जापानी सैनिक ‘कामीकाज़ी’ (आत्मघाती) हमलों और अपनी अंतिम सांस तक लड़ने के संकल्प के लिए जाने जाते थे। अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना था कि अगर वे जापान की मुख्य भूमि पर पारंपरिक सेना से हमला करते हैं, तो इसमें लाखों अमेरिकी सैनिकों की जान जा सकती है। इसी तर्क के आधार पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने परमाणु बम के इस्तेमाल को हरी झंडी दी।

परमाणु हमले के लिए जापान के कई शहरों की सूची बनाई गई थी, जिनमें क्योटो, हिरोशिमा, योकोहामा और कोकुरा शामिल थे। क्योटो को उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता के कारण सूची से हटा दिया गया। अंततः हिरोशिमा को पहले लक्ष्य के रूप में चुना गया क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण सैन्य मुख्यालय और रसद केंद्र था। इसके अलावा, हिरोशिमा की भौगोलिक बनावट ऐसी थी कि पहाड़ियों के कारण बम का प्रभाव और भी घातक होने की संभावना थी।

तारीख थी 6 अगस्त 1945। सुबह के करीब 8:15 बज रहे थे और हिरोशिमा के लोग अपने रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त थे। आसमान में एक अमेरिकी बी-29 बमवर्षक विमान दिखाई दिया, जिसका नाम ‘एनोला गे’ (Enola Gay) था। इस विमान से ‘लिटिल बॉय’ (Little Boy) नाम का यूरेनियम बम गिराया गया। यह बम जमीन से करीब 1,900 फीट की ऊंचाई पर फटा ताकि इसका विनाशकारी दायरा अधिकतम हो सके।

विस्फोट के साथ ही सूरज की सतह से भी ज्यादा गर्म रोशनी की एक चमक उठी। कुछ ही सेकंड के भीतर हिरोशिमा का तापमान 3,000 से 4,000 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया। विस्फोट के केंद्र के पास मौजूद लोग पलक झपकते ही भाप बनकर उड़ गए, पीछे सिर्फ उनकी परछाइयाँ पत्थरों पर रह गईं। एक विशाल मशरूम के आकार का बादल आसमान में उठा और पूरा शहर मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। अनुमान है कि उस दिन करीब 70,000 से 80,000 लोग तुरंत मारे गए।

इतनी बड़ी तबाही के बावजूद जापान ने तुरंत आत्मसमर्पण नहीं किया। जापानी नेतृत्व को लगा कि अमेरिका के पास शायद केवल एक ही ऐसा बम था। लेकिन अमेरिका अपनी ताकत का प्रदर्शन जारी रखना चाहता था। तीन दिन बाद, यानी 9 अगस्त 1945 को, दूसरा हमला किया गया। इस बार लक्ष्य ‘कोकुरा’ शहर था, लेकिन वहां बादल छाए होने के कारण विमान का रुख नागासाकी की ओर मोड़ दिया गया।

सुबह 11:02 बजे नागासाकी पर ‘फैट मैन’ (Fat Man) नामक प्लूटोनियम बम गिराया गया। हालांकि नागासाकी हिरोशिमा की तुलना में अधिक पहाड़ी क्षेत्र था, जिससे विनाश का दायरा थोड़ा सीमित रहा, फिर भी करीब 40,000 लोग तुरंत मारे गए। इन दोनों हमलों ने जापान की रीढ़ तोड़ दी। सम्राट हिरोहितो ने महसूस किया कि यदि युद्ध जारी रहा, तो पूरा जापानी राष्ट्र नक्शे से मिट सकता है।

परमाणु हमले का प्रभाव केवल विस्फोट तक सीमित नहीं था। इसके बाद जो हुआ, वह और भी भयावह था। जिन लोगों की जान बच गई थी, उन्हें एक नई बीमारी ने घेर लिया जिसे ‘रेडिएशन सिकनेस’ कहा गया। लोगों के बाल झड़ने लगे, मसूड़ों से खून आने लगा और शरीर पर नीले धब्बे पड़ने लगे। आने वाले महीनों और सालों में कैंसर और अन्य बीमारियों के कारण मरने वालों की संख्या हिरोशिमा में 1,40,000 और नागासाकी में 70,000 से ऊपर पहुँच गई।

इतना ही नहीं, रेडियोधर्मी विकिरण का असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ा। कई बच्चे जन्मजात विकृतियों के साथ पैदा हुए। इन हमलों ने दुनिया को पहली बार ‘ब्लैक रेन’ (काली बारिश) के बारे में बताया—विस्फोट के बाद आसमान से गिरने वाली वह कालिख और राख वाली बारिश जो जानलेवा विकिरण से भरी थी। प्यासे लोग जब इस बारिश का पानी पीते, तो उनके आंतरिक अंग जल जाते थे।

15 अगस्त 1945 को जापान के सम्राट ने रेडियो पर देश को संबोधित करते हुए आत्मसमर्पण की घोषणा की। 2 सितंबर 1945 को अमेरिकी युद्धपोत ‘मिज़ूरी’ पर आधिकारिक रूप से युद्ध समाप्ति के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए। इसके साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का अंत हुआ, लेकिन मानवता के माथे पर एक ऐसा कलंक लग गया जिसे कभी धोया नहीं जा सका।

आज भी यह बहस जारी है कि क्या यह हमला जरूरी था। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि जापान पहले ही हार मान चुका था और अमेरिका केवल सोवियत संघ को अपनी ताकत दिखाना चाहता था। वहीं, कुछ का तर्क है कि इस बम ने युद्ध को जल्दी खत्म कर लाखों लोगों (दोनों पक्षों के) की जान बचाई जो एक लंबे जमीनी युद्ध में मारे जाते। कारण जो भी रहा हो, लेकिन हिरोशिमा और नागासाकी की राख ने दुनिया को एक कड़ा सबक दिया।

जापान ने इस त्रासदी के बाद खुद को जिस तरह से पुनर्जीवित किया, वह दुनिया के लिए एक मिसाल है। हिरोशिमा आज एक ‘शांति के शहर’ के रूप में जाना जाता है। वहां का ‘पीस मेमोरियल पार्क’ और ‘एटॉमिक बम डोम’ (वह इमारत जो विस्फोट के केंद्र के पास होने के बाद भी खड़ी रही) आज भी दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त रहने की चेतावनी देते हैं।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि विज्ञान की शक्ति जब नफरत और राजनीति के साथ मिलती है, तो वह सृजन के बजाय केवल सर्वनाश का मार्ग प्रशस्त करती है। हिरोशिमा और नागासाकी के ‘हिबाकुशा’ (विस्फोट में जीवित बचे लोग) आज भी शांति का संदेश फैला रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां फिर कभी ऐसा मंज़र न देखें।

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