मंगल की सच्ची कहानी: जो किताबों में नहीं, कैमरे ने दिखाया

मंगल… नाम सुनते ही दिमाग में एक लाल-सा गोला घूम जाता है। कभी कहा गया कि वहाँ युद्ध के देवता रहते हैं, कभी यह भी कहा गया कि वहाँ हरियाली है, पानी है और शायद जीवन भी। लेकिन असली कहानी तब शुरू हुई, जब इंसान ने कल्पनाओं को छोड़कर विज्ञान का झंडा उठाया और अपने बनाए यान मंगल की ओर भेज दिए।

यह कहानी है उन पहले उपग्रहों की, जिन्होंने मंगल को किताबों और कहानियों से निकालकर हकीकत की तस्वीर में बदला।


जब मंगल पहली बार कैमरे में कैद हुआ

साल था 1964। दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई थी, अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष को लेकर होड़ मची थी। इसी दौर में नासा ने एक यान भेजा — मेरिनर-4।

28 नवंबर 1964 को लॉन्च हुआ यह यान करीब आठ महीने तक अंतरिक्ष में भटकता रहा। 14 जुलाई 1965 को वह पल आया, जब मेरिनर-4 मंगल के बेहद करीब से गुज़रा। यह मंगल की कक्षा में नहीं गया, बस पास से निकल गया। लेकिन इसी “बस पास से निकलने” ने इतिहास रच दिया।

मेरिनर-4 ने मंगल की पहली नज़दीकी तस्वीरें पृथ्वी पर भेजीं। और यहीं कहानी में ट्विस्ट आ गया।
जो मंगल इंसान ने कल्पना में बसाया था, वह वैसा नहीं निकला।

  • न हरियाली
  • न समुद्र
  • न नीला आसमान

तस्वीरों में दिखा गड्ढों से भरा, ठंडा और सूखा ग्रह। वैज्ञानिकों को समझ आया कि मंगल का वातावरण बहुत पतला है और वहाँ जीवन वैसा तो बिल्कुल नहीं, जैसा पृथ्वी पर है।

लेकिन यही सच्चाई विज्ञान की जीत थी। पहली बार इंसान ने मंगल को अपनी आंखों से देखा — कैमरे की आंखों से।


अब पास से नहीं, चारों ओर से देखना था

मेरिनर-4 ने सवालों के जवाब दिए, लेकिन नए सवाल भी पैदा कर दिए। सवाल यह था कि अगर मंगल इतना ही बेजान है, तो उसकी सतह पर नदियों जैसी आकृतियाँ क्यों दिखती हैं?

इसी सवाल का जवाब ढूंढने के लिए नासा ने अगला कदम उठाया — मेरिनर-9।

30 मई 1971 को लॉन्च हुआ मेरिनर-9 और 14 नवंबर 1971 को इसने इतिहास रच दिया।
यह बना मंगल की कक्षा में जाने वाला दुनिया का पहला उपग्रह।

लेकिन कहानी यहां भी आसान नहीं थी। जब मेरिनर-9 मंगल की कक्षा में पहुंचा, तो पूरा ग्रह धूल की भीषण आँधी से ढका हुआ था। सतह दिख ही नहीं रही थी। कई महीने इंतज़ार करना पड़ा।

फिर जैसे ही धूल हटी, मंगल ने अपने राज खोलने शुरू किए।


मंगल का असली चेहरा सामने आया

मेरिनर-9 ने जो तस्वीरें भेजीं, उन्होंने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया।

  • ओलिम्पस मॉन्स — सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी
  • वैलेस मेरिनेरिस — धरती की किसी भी घाटी से कई गुना बड़ी दरार
  • सूखी नदियों और घाटियों के निशान

इन सबने एक बात साफ कर दी — मंगल हमेशा से ऐसा नहीं था।
कभी वहाँ पानी रहा होगा, बहती नदियाँ रही होंगी और शायद जीवन के लिए अनुकूल माहौल भी रहा होगा।

यहीं से मंगल को “मरा हुआ ग्रह” मानने की सोच हिल गई।


भारतीय कहानी: कम खर्च, बड़ा कमाल

अब थोड़ा ठहरिए, क्योंकि इस कहानी में भारत का अध्याय भी कम दिलचस्प नहीं है।

साल 2013 में इसरो ने मंगलयान लॉन्च किया। दुनिया को शक था — इतना कम बजट, इतनी बड़ी उड़ान? लेकिन 2014 में मंगलयान मंगल की कक्षा में पहुंच गया।

भारत बना:

  • पहली कोशिश में मंगल ऑर्बिट हासिल करने वाला देश
  • सबसे कम खर्च में मंगल मिशन करने वाला देश

मंगलयान ने दिखा दिया कि अंतरिक्ष में पहुंचने के लिए सिर्फ पैसे नहीं, दिमाग और हौसला चाहिए।


आखिर में बात सीधी-सी

मेरिनर-4 ने हमें मंगल से मिलवाया।
मेरिनर-9 ने हमें मंगल को समझाया।
और मंगलयान ने बताया कि अब यह कहानी सिर्फ महाशक्तियों की नहीं रही।

आज मंगल पर दर्जनों मिशन हो चुके हैं, रोवर चल रहे हैं, मिट्टी की जांच हो रही है। और कल शायद इंसान खुद वहाँ कदम रखे।

लाल ग्रह अब दूर का सपना नहीं, विज्ञान की अगली मंज़िल है।


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