वो ‘शैतानी’ गोला जिसकी नीली रोशनी बनते ही वैज्ञानिकों का शरीर मोम की तरह पिघलने लगा!

क्या था ‘डेमन कोर’? (The Critical Core)

यह कोई साधारण धातु का टुकड़ा नहीं था, बल्कि साक्षात परमाणु ऊर्जा का भंडार था। 6.2 किलोग्राम वजन वाले इस प्लूटोनियम गोले को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ‘फैट मैन’ (नागासाकी पर गिरे बम) की तर्ज पर बनाया गया था। जब युद्ध खत्म हो गया, तो वैज्ञानिकों ने इसे ‘टेस्टिंग’ के लिए रख लिया। वे यह देखना चाहते थे कि यह गोला ‘क्रिटिकल’ (Critical) कब होता है—यानी वो पॉइंट जहाँ परमाणु चेन रिएक्शन शुरू हो जाए और असीमित ऊर्जा (या तबाही) निकलने लगे।

पहली गलती: हैरी डैघलियन की वो घातक भूल (1945)

तारीख थी 21 अगस्त 1945। वैज्ञानिक हैरी डैघलियन लैब में अकेले इस गोले के साथ प्रयोग कर रहे थे। वे इसके चारों ओर ‘टंगस्टन कार्बाइड’ की ईंटें रख रहे थे ताकि न्यूट्रॉन्स को वापस गोले में भेजा जा सके। अचानक, एक ईंट उनके हाथ से छूटकर सीधे गोले पर गिर गई। गोला तुरंत ‘क्रिटिकल’ मोड में चला गया। घबराहट में हैरी ने अपने हाथ से उस गरम ईंट को हटाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उनके शरीर ने इतनी रेडिएशन सोख ली थी कि अगले 25 दिनों में उनके अंग एक-एक कर फेल होने लगे और उनकी एक दर्दनाक मौत हो गई।

‘Tickling the Dragon’s Tail’ और वो फिसलता स्क्रूड्राइवर (1946)

डेमन कोर का सबसे मशहूर और रूह कंपा देने वाला हादसा 21 मई 1946 को हुआ। मशहूर वैज्ञानिक लुई स्लॉटिन (Louis Slotin) एक बेहद खतरनाक प्रयोग कर रहे थे, जिसे विज्ञान की दुनिया में ‘ड्रैगन की पूंछ को गुदगुदाना’ कहा जाता था। वे मात्र एक साधारण स्क्रूड्राइवर की नोक से गोले के दो हिस्सों को आपस में मिलने से रोक रहे थे। अचानक… हाथ फिसला, स्क्रूड्राइवर हटा और दोनों हिस्से आपस में जुड़ गए।

वो नीली रोशनी और मौत का साक्षात अहसास

जैसे ही गोले के दोनों हिस्से मिले, पूरी लैब एक चमकीली नीली रोशनी (Blue Flash) से भर गई। स्लॉटिन को तुरंत समझ आ गया कि मौत ने दस्तक दे दी है। उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए नंगे हाथों से गोले को झटक कर अलग किया। इस बहादुरी से लैब में मौजूद अन्य 7 वैज्ञानिकों की जान तो बच गई, लेकिन स्लॉटिन ने खुद को ‘रेडिएशन का शिकार’ बना लिया। उन्हें तुरंत अपने मुँह में तांबे जैसा खट्टा स्वाद महसूस हुआ और हाथ जलने लगे। मात्र 9 दिनों के भीतर उनके शरीर का मांस गलने लगा और उनकी मौत हो गई।

अंत: ‘शैतानी गोले’ का क्या हुआ?

इन दो मौतों के बाद वैज्ञानिकों में इस गोले का खौफ इतना बैठ गया कि इसका नाम बदलकर ‘डेमन कोर’ रख दिया गया। इसके साथ होने वाले सभी मानवीय प्रयोग तुरंत बंद कर दिए गए। बाद में इस गोले को पिघला दिया गया और इसके प्लूटोनियम को दूसरे परमाणु हथियारों के निर्माण में इस्तेमाल किया गया।

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