भइया, ट्रंप को अब ग्रीनलैंड चाहिए! क्या है ये पूरा माजरा?

आज कहानी उस ज़मीन की, जिसने डोनाल्ड ट्रंप को फिर से ग्लोबल सुर्खियों का हीरो बना दिया है। नाम है ग्रीनलैंड। बाहर से बर्फ़, अंदर से राजनीति का बारूद। दुनिया का सबसे ठंडा इलाक़ा, लेकिन ट्रंप साहब की नज़र में ये सोने की खदान है।

मामला अभी पूरा गरम है। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी ग्रीनलैंड के बिना अधूरी है। और जो यूरोपीय देश इस सोच के रास्ते में खड़े हैं, उन्हें 10 फ़ीसदी टैरिफ़ ठोकने की चेतावनी दे दी गई है। बात यहीं नहीं रुकी। ट्रंप ने ये भी कह दिया कि अगर ग्रीनलैंड “प्यार से” नहीं मिला, तो “सैन्य ताक़त” का रास्ता भी खुला है।

उधर डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने दो टूक जवाब दे दिया—
“हम बिकाऊ नहीं हैं, और कोई रियल एस्टेट डील भी नहीं चल रही।”

लेकिन अगर आपको लगता है कि ये ट्रंप की सनक है, तो ज़रा इतिहास के पन्ने पलटिए। अमेरिका का ज़मीन खरीदने का शौक़ नया नहीं है। आज से करीब 100 साल पहले भी अमेरिका ने डेनमार्क के साथ ऐसा ही एक सौदा किया था।

जब डेनिश वेस्ट इंडीज बना अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स

आज जिन द्वीपों को दुनिया अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स के नाम से जानती है, वो कभी डेनमार्क के कब्ज़े में थे। कैरेबियाई सागर में बसे ये छोटे-छोटे खूबसूरत द्वीप—सेंट थॉमस, सेंट जॉन और सेंट क्रॉइक्स—आज भी अमेरिका का हिस्सा हैं।

यहां करीब 83 हज़ार लोग रहते हैं। ये अमेरिकी नागरिक हैं, लेकिन एक अजीब विडंबना है—ये राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं डाल सकते। अमेरिकी संविधान भी यहां पूरी ताक़त से लागू नहीं होता।

इन द्वीपों की कहानी जितनी सुंदर दिखती है, उतनी ही दर्दनाक भी है। यहां रहने वाले ज़्यादातर लोग उन अफ्रीकियों के वंशज हैं, जिन्हें गुलाम बनाकर गन्ने के खेतों में झोंक दिया गया था। सदियों तक स्पेन, इंग्लैंड और फ्रांस इन द्वीपों पर कब्ज़े के लिए लड़ते रहे। आख़िरकार 1684 में डेनमार्क ने यहां अपना झंडा गाड़ दिया।

1867: जब डील होते-होते रह गई

19वीं सदी आते-आते डेनमार्क की ताक़त ढलान पर थी और अमेरिका उभरती हुई महाशक्ति बन चुका था। तब के अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सीवर्ड की नज़र इन द्वीपों पर पड़ी। उन्हें लगा—कैरेबियाई सागर में एक पक्का अड्डा चाहिए।

7.5 मिलियन डॉलर के सोने में सौदा तय हुआ। लेकिन उसी वक्त अमेरिका ने रूस से अलास्का खरीद लिया। अलास्का डील पर इतना बवाल मचा कि अमेरिकी कांग्रेस ने वर्जिन आइलैंड्स वाली डील को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

वर्ल्ड वॉर और अमेरिका का बदला हुआ तेवर

करीब 50 साल बाद पहला विश्व युद्ध छिड़ा। अमेरिका को डर हुआ कि जर्मनी इन द्वीपों पर कब्ज़ा करके उन्हें पनडुब्बियों का अड्डा बना सकता है। अगर ऐसा होता, तो अमेरिकी जहाज़ सीधे निशाने पर आ जाते।

1915 में जर्मन पनडुब्बी ने ‘लुसिटानिया’ जहाज़ को डुबो दिया। इसके बाद अमेरिका का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उस वक्त अमेरिका का लहजा बिल्कुल वैसा ही था, जैसा आज ट्रंप का है। डेनमार्क को साफ़ संदेश दिया गया— “बेच दो, वरना हम खुद कब्ज़ा कर लेंगे।”

आख़िरकार सोना गया, ज़मीन आई

अगस्त 1916 में आख़िरकार सौदा पक्का हुआ। अमेरिका ने 25 मिलियन डॉलर का सोना दिया—आज के हिसाब से करीब 630 मिलियन डॉलर। बदले में अमेरिका ने डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर अधिकार को मान्यता दी।

डेनमार्क में जनमत संग्रह हुआ और लोगों ने कहा— “ले जाओ, वैसे भी ये हमें अपने नहीं लगते।”

यहीं से डेनिश वेस्ट इंडीज बना अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स। इतिहास यही बताता है कि अमेरिका जब किसी ज़मीन पर नज़र डालता है, तो साम, दाम, दंड, भेद—सब आज़माता है। 1917 में डेनमार्क मजबूर था। लेकिन 2026 में तस्वीर बदली हुई है।

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