उनुकर इरादा हमके सतावे के बा,
हमहि से प्रेम, हमहि से छुपावे के बा।
कब तक देखब छुप-छुप के चांद के,
अब चांद के ही जमीन पर बुलावे के बा।
रोम-रोम में एगो अलगे नशा चढ़ल बा,
इहे खुशबू दुनिया में महकावे के बा।
प्रेम के वासना मत बुझीं, ए भाई,
ई बात मजनुवन के समझावे के बा।
मोबाइल आ इंटरनेट के एह दौर में भी,
कवनो कबूतर से चिट्ठी पहुँचावे के बा।
मन बना लीं त मंजिल दूर कहाँ बा,
सात समंदर पार भी घर बनावे के बा।
‘भावुक’, जब-जब याद सताई,
लवट के, एक ना एक दिन आवे के बा।
