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चोट खा-खा के जिनिगी – कुमार अजय सिंह

चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनललागल भगिया में अगिया, तबाही बनल घाव बड़हन भइलऽ, ऊ नाऽ जल्दी भरीजे डुबवलस ऊ मौका पर, हाथ का…
कुमार अजय सिंह 18 जनवरी 2026 (पब्लिश्ड: 08:49 IST)
कुमार अजय सिंह गीतकार / कहानीकार एकवना घाट, बड़हरा, भोजपुर आरा, बिहार

चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल
लागल भगिया में अगिया, तबाही बनल

घाव बड़हन भइलऽ, ऊ नाऽ जल्दी भरी
जे डुबवलस ऊ मौका पर, हाथ का धरी
ऊ चिन्हलके आदमिया बा, डाही बनल
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल

लोर ढ़रकत ना पोछत, पूछत केहूए बा
का गुजरत ना तनिको,सोंचत केहूए बा
रहनी जेकरा से दूर हम,उहे दाही बनल
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल

का करि जी केहु केकरो प,अब विश्वास
खाइके मरला से नीमन, रहलका उपास
जब जमलका हमार अब ऊ, नाहीं रहल
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल

ना रहिले सर झुकाके, नाहीं रहल चाहीं
बात तनिका भर मनवा के, कहल चाहीं
“अजय” चुपचाप सहल,लरिकाही बनल
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल

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