दू-चार दिन से बड़ा मन चिड़चिड़ाइल रहत रहे, तनी पाकिट ढीला हो गइल रहे से।
सुबह-सुबह दरवाजा केहूँ पीटलस… जा के खोलनी त माई दरवाजा पर खड़ा रहस।
गोड़ लगनी त आशीर्वाद देत कमरा में ढूक अइली।
हम पूछनी – केकरा संगे अइले ह?
त बतवली – भुअरा आवत रहे, त कहनी हमहूँ के लेते चल।
मेहरारू माई के देखते तमतमा उठली।
गोड़ त लगली, बाकिर भुनभुनात बोलली –
“लागता बूढ़िया के पैसा के जरूरत आ गइल बा… नाहीं त एहिजा काहे आवे वाली रही… एहिजा आपन पेट पहाड़ भइल बा, घरवालन के कवन लदिया लदब…?”
इतना कह के मुँह बिजुकावत रसोईघर में घुस गइली।
हम नजर बचावत दोसरा ओर हट गइनी।
एने माई कल पे हाथ-मुँह धो के बगल में रखल प्लास्टिक के कुर्सी पर बैठ के कहली –
“बबुआ, तनी चाय पियाऊ, ताकि सफ़र के थकान दूर हो जाव।”
हम रसोईघर से चाय ले आ के देनी।
कहनी – माई, चाय पी के तनी आराम कर ल।
दू-तीन महीना से तनी हाथ कुछ ढीला चल रहल बा।
परी बिटिया के जूता भी फाट गइल बा। रोज कहतिया कि स्कूल में सब चिढ़ावत बा, काहे से कि एगो अंगुरी बाहर निकल आवेला।
हम रोज टार देत रहनी – हाथ में कुछ आवे त सबसे पहिले बुचिया के जूता किनम।
मेहरारू के इलाज खातिर दवाई तक ना खरीद पइनी।
माई के अबहिये आवे के रहे — ई सोच के मन अउरी भारी हो गइल।
घर में गजब के चुप्पी रहे।
मेहरारू के मुँह देखे जोग ना रहे।
दुपहरिया में खाना खाए घरी हम माई के भीरी खड़ा रहनी।
माई इशारा कइली — भीरी बैठ जा।
हम बैठ गइनी, मन में सोचत कि कहीं कउनो आर्थिक परेशानी लेके त ना अइली हई…
माई खाना खा के पूछली –
“सब ठीक बा नू?”
हम हिचकिचात कहनी –
“हँ, सब ठीक बा।”
माई उठ के चौकी पर बइठ गइली — एकदम निफिकिर।
हम थरिया ले जाए खातिर मेहरारू के गोहरइनी। उहो आ के थरिया उठा ले गइली।
माई से कहनी – तनी आराम कर।
माई कहलस – एह चौकी पर तहरे लगे बइठब।
हम साँस रोक के माई के मुँह ताकत बइठ गइनी।
रोआँ-रोआँ कान बन के सुनत रहनी — अब माई का कहिहें?
तब माई बोलली –
“खेती-किसानी में घड़ी भर फुरसत नइखे मिलत तहरा बाबूजी के। चइत के कटनी चरम पर बा।
रात वाला गड़िया धरा दिहअ, ओहिसे हम गावे चल जइब। तीन महीना से तहरा लोगन के कउनो समाचार ना मिलल रहे, त बाबूजी कहलन — भुअरा जात बा, ओकरे संगे चल जा, बबुआ लगे।”
“जब तू परेशान होल तबे अइसन करेलअ…”
इतना कह के माई अपना कुर्ती से सौ-सौ के पचास नोट निकाल के हमरा ओर बढ़ा दिहली –
“रख लअ… तहार बाबूजी देलन ह। तहरा काम आई।
गेहूँ के फसल अच्छा भइल रहे, पहिले ही कटवा के बेच देलन। तरकुलवा खाए खातिर रखाई, काल परसो कटी।”
“घरे कउनो दिक्कत नइखे। तू बहुत कमजोर लागतारअ। ढंग से खाइल-पियल करअ। बहू आ बाल-बच्चा के ध्यान राखअ।
बुचिया पढ़े जाए घरी गोड़ लागे आइल रहे — ओकर जूता फाटल रहे, किन दिहा।”
हम नीचे मुड़िया के लजा गइनी।
कुछो कहे के शब्द ना रहे।
दरवाजा के पीछे से ई सब बतकही मेहरारू भी सुनत रहे। उहो आपन आप के कोसत रहे — माई के बारे में अइसन सोचले खातिर।
हम कुछ कहती, ओह से पहिले माई प्यार से डांटलस –
“ले धर, अतना बड़ नइखीस हो गइल?”
हिचकिचात कहनी – “ना माई…”
माई नोट हमरा हथेली पर रख दिहली।
ऊ दिन याद आ गइल, जब बरसों पहिले माई स्कूल भेजे घरी अइसहीं हथेली पर अठन्नी रख देत रहस, आ हम बाबूजी के अंगुरी पकड़ के फुदकत स्कूल निकल जात रहनी।
पर तब नजर आज लेखा झुकल ना रहत रहे…



