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ए शीतलहरी काकी-डॉo यशवन्त केशोपुरी

यह ठंड सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि मनुष्य की असहायता और प्रकृति की कठोरता का प्रतीक बन गई है। लोग राहत और शरण की तलाश में हैं, लेकिन शीतलहरी निर्दय होकर सबको कंपकंपाने पर मजबूर कर रही है।

डॉo यशवन्त केशोपुरी 11 जनवरी 2026 (पब्लिश्ड: 02:15 IST)

जाड़ से एतना हाड़ कपवलु, दम तू कईलु नाकी-
ए शीतलहरी काकी
रखलु ना करम कवनो बाकी-ए शीतलहरी काकी

करी कोई ड्यूटी कइसे, जाई अपना काम-धन्धा।
धुन्ध से रोड पर सूझत नइखे, भईल आदमी अन्धा।

मांगत बा सभे पनाह अब, देख के तोहर बेबाकी-
ए शीतलहरी काकी …..

तापमान दिन पर दिन गिरे, भईल पांच से नीचे।
अब त ई समझे ना आवे, के नहाव के फिंचे।

पाला गोड़ नाहीं गरमाला, केतनो कम्बल में माकी-
ए शीतलहरी काकी …..

राहत के ना सांस मिलेला, बीते दिन अगिया तापत।
घाम के दर्शन होते नइखे, थर थर बा सब कांपत।

ओस में सुरुजदेव लुकाके, मारेलन अब फाकी-
ए शीतलहरी काकी …..

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