चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल
लागल भगिया में अगिया, तबाही बनल
घाव बड़हन भइलऽ, ऊ नाऽ जल्दी भरी
जे डुबवलस ऊ मौका पर, हाथ का धरी
ऊ चिन्हलके आदमिया बा, डाही बनल
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल
लोर ढ़रकत ना पोछत, पूछत केहूए बा
का गुजरत ना तनिको,सोंचत केहूए बा
रहनी जेकरा से दूर हम,उहे दाही बनल
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल
का करि जी केहु केकरो प,अब विश्वास
खाइके मरला से नीमन, रहलका उपास
जब जमलका हमार अब ऊ, नाहीं रहल
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल
ना रहिले सर झुकाके, नाहीं रहल चाहीं
बात तनिका भर मनवा के, कहल चाहीं
“अजय” चुपचाप सहल,लरिकाही बनल
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनल



