ए शीतलहरी काकी-डॉo यशवन्त केशोपुरी

जाड़ से एतना हाड़ कपवलु, दम तू कईलु नाकी-
ए शीतलहरी काकी
रखलु ना करम कवनो बाकी-ए शीतलहरी काकी

करी कोई ड्यूटी कइसे, जाई अपना काम-धन्धा।
धुन्ध से रोड पर सूझत नइखे, भईल आदमी अन्धा।

मांगत बा सभे पनाह अब, देख के तोहर बेबाकी-
ए शीतलहरी काकी …..

तापमान दिन पर दिन गिरे, भईल पांच से नीचे।
अब त ई समझे ना आवे, के नहाव के फिंचे।

पाला गोड़ नाहीं गरमाला, केतनो कम्बल में माकी-
ए शीतलहरी काकी …..

राहत के ना सांस मिलेला, बीते दिन अगिया तापत।
घाम के दर्शन होते नइखे, थर थर बा सब कांपत।

ओस में सुरुजदेव लुकाके, मारेलन अब फाकी-
ए शीतलहरी काकी …..

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