मितवा जबसे गांव हम छोड़नी-मुकेश यादव

रेसा-रेसा छूट गइल,
का बताईं, का टूट गइल।
मितवा जबसे गांव हम छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।

शहर त बा, पर अपनावत नइखे,
गांव भी त, अब बोलावत नइखे,
लोग कहेला, मजा मारत होइहें,
रुपिया के अइसन गारत होइहें।

मुड़ी के अब बार ना बचल,
दिल में केतना दुख भइल।
मितवा जबसे गांव हम छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।

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