रेसा-रेसा टूट गइल,
का बताईं, का छूट गइल।
मितवा जबसे गाँव छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।
शहर त बा, पर अपनावत नईखे,
गाँव भी अब त बोलावत नईखे,
लोग कहेला— ‘मजा मारत होइहें’,
रुपिया के अइसन गारत होइहें।
मुड़ी के अब बार ना बचल,
जियते गहिरा दुख भइल।
मितवा जबसे गाँव छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।
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