मितवा जबसे गांव हम छोड़नी-मुकेश यादव

मुकेश यादव "भावुक" 2 Subscribers
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@bhawuk • 364 Views • 30 नवम्बर, 2025

रेसा-रेसा टूट गइल,
का बताईं, का छूट गइल।
मितवा जबसे गाँव छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।

​शहर त बा, पर अपनावत नईखे,
गाँव भी अब त बोलावत नईखे,
लोग कहेला— ‘मजा मारत होइहें’,
रुपिया के अइसन गारत होइहें।

​मुड़ी के अब बार ना बचल,
जियते गहिरा दुख भइल।
मितवा जबसे गाँव छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।

कठिन शब्द अउर अर्थ

Purvaiya
मुकेश यादव "भावुक" @bhawuk

रेसा-रेसा टूट गइल,
का बताईं, का छूट गइल।
मितवा जबसे गाँव छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।

​शहर त बा, पर अपनावत नईखे,
गाँव भी अब त बोलावत नईखे,
लोग कहेला— 'मजा मारत होइहें',
रुपिया के अइसन गारत होइहें।

​मुड़ी के अब बार ना बचल,
जियते गहिरा दुख भइल।
मितवा जबसे गाँव छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।

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