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मितवा जबसे गांव हम छोड़नी-मुकेश यादव

जबसे अपना गाँव, अपना घर-आँगन, अपना बचपन और अपनापन छोड़कर बाहर निकले हैं,
तबसे किस्मत जैसे रूठ गई है।
ना पहले जैसी खुशियाँ हैं, ना वो सुकून, ना वो अपनापन।

मुकेश यादव "भावुक" 30 नवम्बर 2025 (पब्लिश्ड: 09:04 IST)

रेसा-रेसा टूट गइल,
का बताईं, का छूट गइल।
मितवा जबसे गाँव छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।

​शहर त बा, पर अपनावत नईखे,
गाँव भी अब त बोलावत नईखे,
लोग कहेला— ‘मजा मारत होइहें’,
रुपिया के अइसन गारत होइहें।

​मुड़ी के अब बार ना बचल,
जियते गहिरा दुख भइल।
मितवा जबसे गाँव छोड़नी,
किस्मत हमसे रूठ गइल।

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