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भोजपुरी साहित्य
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रूठल बाड़ी आजो प्यारी

तौसीफ़ अहमद , ब्रह्मपुर, बक्सर
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1 नवम्बर 2026 · 11:16 अपराह्न IST

रूठल बाड़ी आजो प्यारी,
सुन्न पड़ल बा घर-दुआरी।

ना ऊ हँसी , ना ऊ बतकही,
दिन दुपहरिया लागे भारी।

रोज सबेरे जवन मुस्का के,
दिन के देत रहली उजियारी।

उनकर चुप्पी अब एतना चुभे,
जइसे सीना पर चले कटारी।

पकवान से थाल सजल बा,
बाकिर फीका बा मन प्यारी।

तोहरे बिना ए सजनी लागे,
अधूरा हर खुशी हमरी प्यारी।

कहे “तौसीफ़” मान जा सजनी,
तोहरे में बसल जान दुलारी।

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