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कविता

कबो बाढ उजार देला, कबो सूखा मार देला

का बताईं गृहस्थी से का उद्धार होला?कबो बाढ उजार देला, कबो सूखा मार देला। समय समय पर खेत मे, सिंचाई जब ना होला।त डेहरी चाहे बखार मे अन्न के खिंचाई ना होला।…
जमील मीर , दम्माम,सऊदी अरब
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1 नवम्बर 2026 · 12:12 पूर्वाह्न IST

का बताईं गृहस्थी से का उद्धार होला?
कबो बाढ उजार देला, कबो सूखा मार देला।

समय समय पर खेत मे, सिंचाई जब ना होला।
त डेहरी चाहे बखार मे अन्न के खिंचाई ना होला।

खाद बीज लेवे मे, महंगाई मार देला।
का बताईं गृहस्थी से का उद्धार होला?

रोपनी सोहनी कइले मे देह के दासा बिगड़ जाता
कर्जा लेके बैंक से किसान सभे मर जाता

आनाज बजार मे गइले पर, भाव सभे बिगाड़ देला।
का बताईं गृहस्थी से का हमार उद्धार होला।

उहे आनाज हमरे घर से कवन भाव मे जाता?
बनिया के हाथे गइले पर ऊ कवन भाव बिकाता?

हमरे साथे कांहे ई कुल, छल व्यवहार होला?
का बताईं गृहस्थी से, हमार का उद्धार होला।

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