एके साँसे बस धावत गइनी।
सगरी बोझा उठावत गइनी।
जेकरा जब जरूरत पड़ल,
हँसी आपन लुटावत गइनी।
प्रीत पावे के लालसा रहे,
नफ़रत उनकर पावत गइनी।
आँख चोरा के भागल सभे,
हम त बस मिलावत गइनी।
पता बा अब कुछ सुधरी नाही,
आश के ढ़िबरी जरावत गइनी।
जिनगी ह क़ीमत चुकावे के बा,
खुद ई बात समझावत गइनी।