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भोजपुरी कहानी
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अन्नदाता / एगो मार्मिक भोजपुरी कहानी

गाँव के छोर पर एगो छोटहन मड़ई रहे। ओही मड़ई में रहत रहे रामधनी। नाम त रामधनी रहे, बाकिर किस्मत में धन के एको दाना ना रहे। जिनगी भर दूसर के पेट…
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1 नवम्बर 2026 · 12:38 अपराह्न IST

गाँव के छोर पर एगो छोटहन मड़ई रहे। ओही मड़ई में रहत रहे रामधनी। नाम त रामधनी रहे, बाकिर किस्मत में धन के एको दाना ना रहे। जिनगी भर दूसर के पेट भरे खातिर अनाज उपजवलस, बाकिर अपना परिवार के पेट भरल हमेशा ओकरा खातिर एगो चुनौती बनल रहल।


भोर के पहिलका किरिन निकलते रामधनी कंधा पर हल रख के खेत के ओर निकल जात रहे। ओकर हाथ के हथेली में पड़ल घट्टा ओकर मेहनत के गवाही देत रहे। जेठ के तपत दुपहरिया होखे चाहे पूस के कँपावत रात, ऊ खेत में पसीना बहावत रहे।


ओकरा बस एगो सपना रहे कि एक दिन आपन खेत में लहलहात फसल देखी आ परिवार के चेहरा पर मुस्कान आई।
बाकिर किस्मत के खेल कुछ अउर रहे।


कबो सूखा पड़ गइल, त कबो बाढ़ सब कुछ बहा ले गइल। कबो फसल में कीड़ा लाग गइल, त कबो बाजार में अनाज के सही दाम ना मिलल। खेती करे खातिर लिहल कर्जा धीरे-धीरे पहाड़ बन गइल।


एक दिन महाजन आके कहले— “रामधनी! अब बहुते दिन हो गइल। कर्जा कब लौटइबऽ? ना त खेत हमार नामे लिखवा दिहऽ।”
रामधनी हाथ जोड़ के कहले— “मालिक! थोड़ा समय अउर दे दीं। अगिला फसल होखे दीं, एक-एक पइसा चुका देब।”
महाजन हँसत-हँसत चल गइल, बाकिर रामधनी के आँख में लोर छोड़ गइल।


घरे आके देखलस त ओकर बेटी गुड़िया चूल्हा के लगे बइठल रहे। ऊ धीरे से कहलस— “बाबूजी! हमरा खातिर चिंता मत करीं। हमार बियाह खातिर कर्जा मत लीं। हम पढ़-लिख के कुछ बन जाइब।”
ई सुनते रामधनी के कलेजा फाट गइल।
बेटी के माथा पर हाथ फेरत कहलस— “बेटी! बाप के सबसे बड़ धन ओकर बेटी होले। तोहार डोली उठावल हमार सपना ह।”


बाकिर रात में जब पूरा गाँव सुत जात रहे, तब रामधनी के आँख में नींद ना आवत रहे। कभी बेटी के बियाह के चिंता, कभी महाजन के कर्जा, त कभी परिवार के भविष्य ओकरा के भीतर से खोखला करत रहे।
ओकर मेहरारू भी अब कमजोर हो गइल रहे। बरिसन के मेहनत आ अभाव ओकर चेहरा पर झुर्री बन के उतर आइल रहे।


एक दिन रामधनी खेत में गेहूँ काटत-काटत अचानक गिर पड़ल। हथेली में हँसुआ रहे आ माथा से पसीना टपकत रहे। गुड़िया दौड़ के अइलस आ बाबूजी के गोदी में माथा रख के रोवे लगल।


“बाबूजी! अब मत करीं एतना मेहनत। हमरा कुछ ना चाहीं। बस रउआ ठीक रहस।”
रामधनी धीरे से मुस्कुराइल आ कहलस— “बेटी! हमार जिनगी त खेत में बीत गइल। बाकिर तोहार सपना अधूरा ना रहे के चाहीं।”
समय बीतत गइल। कर्जा बढ़त गइल। आखिरकार रामधनी के खेत महाजन के हाथे चल गइल। जवना माटी के अपना खून-पसीना से सींचले रहे, ओही माटी पर अब ओकर आपन हक ना रहल।
अब ऊ दूसर के खेत में मजदूरी करे लागल।


एक दिन गाँव में बड़का भोज रहे। पूरा गाँव के लोग खीर-पूड़ी खा रहल रहे। रामधनी के बेटी गुड़िया ओहिजा बर्तन उठावे गइल रहे। ओकरा बाबूजी दूर खड़ा लोगन के पत्तल में खाना परोसत देखाई देले।
गुड़िया के आँख भर आइल।


ऊ सोचत रहे— “जे आदमी पूरा दुनिया के पेट भरेला, आज ओकरा अपना घर में दू जून के रोटी खातिर संघर्ष करे के पड़ता।”
ओही रात रामधनी मड़ई के टूटल खटिया पर लेटल रहे। छत से पानी टपकत रहे। ऊ आसमान के ओर ताकत सोचत रहे कि आखिर किसान के जिनगी में सुख के दिन कब आई?


कुछ दिन बाद रामधनी के तबीयत अउरी बिगड़ गइल। गाँव के लोग जुटल। गुड़िया बाबूजी के हाथ पकड़ के रोवत रहे।
रामधनी आखिरी साँस लेत कहले—
“बेटी… जबो थरिया में रोटी देखबू, त समझिहऽ कि ओकरा पीछे कवनो किसान के पसीना बा। अन्न के कदर करिहऽ। किसान के कभी छोट मत समझिहऽ।”


एतना कहके ऊ हमेशा खातिर आँख मूँद लिहलस।
आज रामधनी नइखे, बाकिर ओकर कहानी गाँव के हर खेत में जिंदा बा।
ओकर बेटी पढ़-लिख के शिक्षिका बन गइल। ऊ हर बच्चा के ई सिखावे लागल कि किसान खाली अनाज ना उपजावेला, ऊ पूरा देश के जिनगी उपजावेला।


बाकिर एगो सवाल आजो हवा में गूँजता—
जे किसान दूसर के घर में चूल्हा जरावेला, ओकर आपन चूल्हा काहे बुझे ला?
जे किसान पूरा दुनिया के पेट भरावेला, ओकर पेट काहे खाली रहेला?
जे माटी से सोना उपजावेला, ओकर आपन जिनगी काहे कर्ज में डूबल रहेला?


सच कहल गइल बा—
किसान के हाथ में छाला बा,
माथ पर कर्जा के बोझ बा।
दुनिया के पेट भरे वाला,
आज खुद रोटी के मोहताज बा।
किसान के सम्मान खाली भाषण से ना, ओकर मेहनत के सही कीमत देला से होई।


काहे कि किसान जिंदा रही, तभी देश के थरिया में रोटी रही।
जय जवान! जय किसान!

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