करिया कुकुर (भोजपुरी व्यंगात्मक लघु कहानी)

राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'

23 अप्रैल, 2026

​आजकल के जमाना देख के मन भकुआ जाला। शौक के कवनो ओर-छोर नइखे रह गइल। जहाँ पहिले दुआर पर गाय-गोरु के रँभाईल सुभ मानल जात रहे, ओहिजा अब कुकुर पोसल जा रहल बा। पहिले स्वागत में कुछु लिखात रहें मेन दरवाजा के आसपास अब कुकुर से बचे के चेतावनी लिखल लउकत बा। आ तनी ओकर तवज्जो देखल जाव… कुकुर न भइल, कवनो वीआईपी (VIP) मेहमान भइल!

​हमार पड़ोसी भइया जी, जे हर बात में ‘राजधानी’ के रट लगावेले, ऊहो एगो करिया कुकुर ले अइलन। दाम पूछनी त अइसन गरबइलन जइसे कवनो मंगल ग्रह के प्राणी के सौदा क के आइल होखस— “अरे का बताई भयवा, 12000 के त खाली बच्चा रहे, 14000 त ओकरा दवाई-बिरोई में लाग गइल। खास पटना के शौकीन घर के नसल (Breed) ह!”

​हमहूँ तनी ‘तेल’ लगावे खातिर बिना मन के कह देनी— “वाह भइया! मान गइनी। कुकुर त कुकुर बा, एकदम कुचु-कुचु करिया! अइसन स्मार्ट लुक त पूरा जवार में केहु के कुकुर के नइखे। एकदम लाजवाब बा राउर ई कुकुर.. राउर पसंद के त कवनो जवाबे नइखे!”

​एतना सुनत कहीं कि भइया जी के ‘कॉन्फिडेंस’ सातवाँ आसमान चीर दिहलस। अब ऊ अंग्रेजी आ हिंदी के खिचड़ी (हिंग्लिश) बना के कुकुर के खान-पान से लेके ओकरा पखाना तक के ‘महिमा मंडन’ शुरू कर देहलन। हम बेचारा, भोजपुरी देहाती मन, जम्हाई लेत-लेत उनकर गप लपेटे लगनी जैसे तिलंगी उडावत घरी कटला के बाद लटाई में धागा लपेटत होखी… एकदम मुँह चोथा लेखा बनवले.. झवाइल मन से!

​मने-मन सोचत रही कि— भाला होखे ई भइया जी के, जे खुद दिन भर कवनो न कवनो नशा में चूर रहेले, माई-बाबू के एकलौता ‘कुल-दीपक’ (वारिस) हउअन, आ जिनका घर के शाकाहारी चूल्हा पर कसहूँ दाल-भात चड़त बा… ऊ आज कुकुर के ‘डाइट’ (Diet) पर लेक्चर दे रहल बाड़न!

​हँसी त तब रोके ना रुकल जब ऊ कहलन— “देखऽ भाई, एकरा के हम रोज केला, सेब आ गाय के पियोर दूध-भात खियाइला। एकदम सात्विक भोजन! रोज मतलब प्रतिदिन, एको दिन नागा ना!”

​हमरा के कृषि के पढ़ाई में ‘एनिमल हसबेंडरी’ (पशुपालन) वाला मास्टर साहब पढ़ावत रहन कि कुकुर मूल रूप से मांसाहारी जीव ह। आ हमहूँ जवार में देखले बानी कि कइसन करिया-उजर कुकुर अंडा-मांस देखला पर गप-गप लेल लपकावेले। अब भइया जी के ई ‘शाकाहारी कुकुर’ कवन नया अवतार रहे, ई त भगवानें जानस!

​एतने में ऊ ‘करिया कुकुर’ अपना मालिक के संगे प्रस्थान करे लागल। जाते-जाते ऊ हमरा गली में ‘लिक्विड फॉर्म’ में पातर पोट्टी (छेरत) करत गइल। जइसे कहत होखे— “बड़ाई त खूब कइलऽ, अब ई प्रसाद भोगऽ!”

​हम चैन के साँस लेबे ही वाला रहनी कि नजर पड़ल— हमरा घर के ठीक सोझै, दरवाजा के मुँह पर ऊ कुकुर लिक्विड वाला ‘सिंगार’ क के गइल रहे। हम मन ही मन कुकुर के पगहा धइले भइया जी के ‘गरियावत’ गली के बाल्टी-पानी ले के साफ करे लगनी कि बिहान कवनो मान-जान के गोड़ ओकरा में पवितर मत हो जाव।

​अब जा तानी देह-हाथ धोए… काहें कि जब गाय-गोरु पोसे वाला खानदान कुकुर के डाइट चार्ट बनावे आ ओकर बखान लागे करें नू , त आदमी के भकुआइल तय बा! जइसे हमरा दिने में जोन्हि लउकत रहें।

✍️राघवेंद्र प्रकाश ‘रघु’
ब्रह्मपुर, बक्सर (बिहार)

कठिन शब्द अउर अर्थ

  • बाल्टी: बाल्टी।
  • माई: माता।
  • भात: पका चावल।
  • भाला: एक हथियार।
  • पगहा: पशुवन के बांधे वाला मोटा रस्सा।
  • जात: अनाज पीसे वाला पत्थर के चक्की। (प्रयोग: जांत के पीसल आटा बहुत निमन लागेला।)

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राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'

कलमकार अउर नोकरी बक्सर

"राघवेन्द्र प्रकाश 'रघु' बिहार के बक्सर जिला के ब्रह्मपुर गाँव के रहे वाला बानी। इहाँ के भोजपुरी आ हिंदी मे रचना रचत रहेनी। इहाँ के शिक्षा स्नातकोत्तर (क़ृषि) टी.डी. कॉलेज जौनपुर, उत्तर प्रदेश से प्राप्त करले बानी। साहित्य प्रेमी के साथ वर्तमान में क़ृषि विभाग, बिहार सरकार में एगो कर्मचारी बानी।"

Maati Kavi Sammelan
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