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कविता
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लफड़ा बा बहुत किसानी में / किसान के दरद

बूड़ल जजाती सब पानी में।
लफड़ा बा बहुत किसानी में।

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1 नवम्बर 2026 · 09:48 पूर्वाह्न IST

बूड़ल जजाती सब पानी में।
लफड़ा बा बहुत किसानी में।

सावन में सूखा पड़ जाला।
बिचड़ा बियाड़ में जर जाला।
माने ना हार किसान कबो,
मौसम से सीधा लड़ जाला।
चाहें केतनों मुश्किल आवे,
आसा झलके ला बानी में।
लफड़ा बा बहुत किसानी में।

बदरा जब मुंह बिजुकावे ला।
बरखा ना ताव प आवे ला
तब घोर निराशा में किसान,
दमकल से धान उगावे ला।
जब लागे घाम छेहाँ ले ला,
खेते में पड़ल मचानी में।
लफड़ा बा बहुत किसानी में।

लटके जब बाली धाने के।
जागे अरमान किसाने के
आसा के ज्योति जरे लागे,
मुखड़ा लागे तब चाने के।
गदगद होला भीतरे भीतर,
चमकी सोना खलिहानी में।
लफड़ा बा बहुत किसानी में।

दुख जाला कहाँ दुआरे से।
घर अँगनइया चौबारे से।
कर्जा किसान के साथी हऽ।
ना उतरे कबो कपारे से।
माई माटी ना छोड़े ला,
होला केतनों परेशानी में।
लफड़ा बा बहुत किसानी में।

अचके तुफान जब आवे ला।
सगरो अरमान मुआवे ला।
तैयार फसल नुकसान भइल,
हियरा में हूक उठावे ला।
कोठी खुशहाल रहे हरदम,
दुख पइसल रहे पलानी में।
लफड़ा बा बहुत किसानी में।

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