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कविता
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कतहत पीर पहाड़ भइल बा / किसान के दरद

गिरहत के रोंवा ठाढ़ भइल बा,कातिक में आषाढ़ भइल बा,ना जाने भगवान के काहे..आज करेजा गाढ़ भइल बा! सावन चाम जरावत बीतल,भादो धान पटावत बीतल,अब बरसि तब बरसि बदराइहे रोज मनावत बीतल,जइसे…
राम सागर सिंह , सिवान, बिहार
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31 अक्टूबर 2026 · 10:33 अपराह्न IST

गिरहत के रोंवा ठाढ़ भइल बा,
कातिक में आषाढ़ भइल बा,
ना जाने भगवान के काहे..
आज करेजा गाढ़ भइल बा!


सावन चाम जरावत बीतल,
भादो धान पटावत बीतल,
अब बरसि तब बरसि बदरा
इहे रोज मनावत बीतल,
जइसे मास कुआर के आइल
बरखा बादर फाड़ भइल बा!


आन्ही पानी एतना आइल,
खेत में सगरी धान पटाइल,
मेहनत पर सब पानी फिरल
फसल देखि के आंख लोराइल,
जवन कुआर के खतम ना भइल
दरद उहे फेरु ताड़ भइल बा!


कातिक अस लगवलस पाही,
मोथा ले के आइल तबाही,
बाँचल रहे अब उहो डुबल
भइल बेकार लगावल टाही,
रामसागर हम केतना बतलाईं
कतहत पीर पहाड़ भइल बा!

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