फिर से सपना टूट गइल बा, सब अरमान हेराइल बा।
का बतलाईं उहे पुरनका बोनस फेरू आइल बा।
सोना के महंगाई देखीं, आसमान में भाग गइल।
आठ साल से एक चवन्नी, बोनस में ना वृद्धि भइल।
ऊपर से हल्ला करवावे, भारी बोझ खजाना पर।
लानत बा सरकार ई तोरी, चिटुकी भर नजराना पर।
बात करे अठहत्तर दिन के, ना कछू नया भेंटाइल बा ।
का बतलाईं उहे पुरनका बोनस फेरू आइल बा।।
खबर छपल बा फ्रंट पृष्ठ पर, खुशहाली के आमद बा।
कामगार से पूछे केहू, ऊ अब केतना गदगद बा।
उछल उछल के अपने हाथे, आपन पीठ ठेठावल जा ता।
महँगाई की मुद्दा पर ठेठर जस गाल बजावल जा ता।
बागवान सुधि लेते नइखे, फूल काहें कुम्हिलाइल बा।
का बतलाईं उहे पुरनका बोनस फेरू आइल बा।।
दूना दाम बढ़ल चीनी के, महँगा आटा चावल बा।
सबसे बड़ समस्या इहवां, साहब के समझावल बा।
पत्थर पिघली पानी होई, साहब के मन ना पिघली।
दाम बढ़ल कपड़ा लत्ला के, महँगा बा पानी बिजली।
शीश महल के रहवइया ऊ, उनके कहाँ बुझाइल बा।
का बतलाईं उहे पुरनका बोनस फेरू आइल बा।