पुरवइया

अपने लोग अब पराया हो गइल

अपने लोग अब पराया हो गइल। गांव से बरगद के सफाया हो गइल। मेल-जोल अब धतूरा सन जहरीला भइल, आम-अमरुद के स्वाद पुराना हो गइल।…
मुकेश यादव "भावुक" 23 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 02:39 IST)

अपने लोग अब पराया हो गइल।
गांव से बरगद के सफाया हो गइल।

मेल-जोल अब धतूरा सन जहरीला भइल,
आम-अमरुद के स्वाद पुराना हो गइल।

चिउंटी के चीनी खियावे वाला लोग कहाँ गइल,
अब त आदमी, आदमी के ही निशाना हो गइल।

डीह बाबा के चउरा पर बैठकी के रिवाज हेराइल,
जब से हर आँगन मे मोबाईल के जमाना हो गइल.

सच कहे वाला के अब के सुनत बा एहिजा,
झूठ के बाजीगर ही सबसे सेयाना हो गइल.

खेत खलिहान छोड़ शहर भागे लागल सब,
माटी से रिश्ता भी अब बेगाना हो गइल.

के सुनी अब झूमर, झारी, चइता, बिरहा, कजरी,
“भावुक” के बोली अब बस फसाना हो गइल।

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