आखिर उनसे रिश्ता का बाऽ?
अब तऽ कुछ तू बोल रे मनवा!
आँख के राहे नींद, नींद में
बदरी अस छा जालीं
हवा के जईसन डोल-डोल के
धुआँ – धुआँ हो जालीं
बदरी धुआँ के रिश्ता वाला
भेद जरा तू खोल रे मनवा
छन में धरती छन में अम्बर
छन में नील गगन में
पलक झपकते पर्वत घाटी
बाग – बगईचा वन में
पर्वत, नदिया, झरना, घाटी
कईसन बा ई झोल रे मनवा
काश! ठहरतीं पल भर खाती
बस दू बोल हो जाईत
कुछ हम आपन कुछ ऊ आपन
कह के चैन भेंटाईत
चैन बिना एह जिनगी के ना
होला कवनो मोल रे मनवा