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भोजपुरी साहित्य
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रेशम के कीड़ा के तरे खुदहीं बनावत जाल बा

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10 अप्रैल 2026 · 04:16 अपराह्न IST

रेशम के कीड़ा के तरे खुदहीं बनावत जाल बा
ई आदमी अपने बदे काहें रचत जंजाल बा

पानी के बाहर मौत बा, पानी के भीतर जाल बा
लाचार मछरी का करो जब हर कदम पर काल बा़

झूठो के काहे आँख में केहू भरेला लालसा
काल्हो रहे बदहाल ऊ, आजो रहत बदहाल बा

कइसे रही, कहँवाँ रही, ई मन भला सुख-चैन से
बदले ना हालत तब दुखी, बदले तबो बेहाल बा

अइँठात बा मन्दिर के बाहर भीखमंगा भूख से
मंदिर के भीतर झाँक लीं, पंडा त मालेमाल बा

केहू के नइखे पूत तऽ, केहू के नइखे नोकरी
‘भावुक’ धरा पर आदमी हरदम रहल कंगाल बा

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