जिनगी के का-का तमाशा देखावे जरूरत,
कबो हँसावे त कबो ई रोवावे जरूरत।
शेर जंगल के त राजा हवे बाकिर इहाँ,
अब सियारो के गद्दी प बइठावे जरूरत।
महल के चाहत में रस्ता भुला गइनी हम,
अब त झोपड़िउ में नेह के जगावे जरूरत।
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कुहुके करेजवा में हमरो करेजवा, एजवा मारिये दिहलs
चलत जबले जिनगी के गाड़ी रहे
कईसे हम ईद मनवनी ह
राह जोहत ही नेह के दियना बुता गइल,
अब फालतू में काहें के हाथ जलावे जरूरत।
बा शतरंज के बिछौना ई सगरो जहान,
इहाँ अपने के ही मोहरा बनावे जरूरत।
जब मिले ना उजियार राह में ‘भावुक’ कहीं,
तब त खुद के ही सूरज बनावे जरूरत।