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जिनगी के का-का तमाशा देखावे जरूरत

जिनगी के का-का तमाशा देखावे जरूरत,कबो हँसावे त कबो ई रोवावे जरूरत। ​शेर जंगल के त राजा हवे बाकिर इहाँ,अब सियारो के गद्दी प बइठावे…
मुकेश यादव "भावुक" 8 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 06:28 IST)

जिनगी के का-का तमाशा देखावे जरूरत,
कबो हँसावे त कबो ई रोवावे जरूरत।

​शेर जंगल के त राजा हवे बाकिर इहाँ,
अब सियारो के गद्दी प बइठावे जरूरत।

​महल के चाहत में रस्ता भुला गइनी हम,
अब त झोपड़िउ में नेह के जगावे जरूरत।

​राह जोहत ही नेह के दियना बुता गइल,
अब फालतू में काहें के हाथ जलावे जरूरत।

​बा शतरंज के बिछौना ई सगरो जहान,
इहाँ अपने के ही मोहरा बनावे जरूरत।

​जब मिले ना उजियार राह में ‘भावुक’ कहीं,
तब त खुद के ही सूरज बनावे जरूरत।

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