देखि के बाग के फूल मउरा गइल।
का भइल आदमी आज बउरा गइल।।
ना रहल आस जब आँखि पर ओकरा।
आँख अछइत कली आज कजरा गइल।।
गाँठ बान्हल गइल गाँछि पर दाबि के।
साँझि ले गाँठि तs खूब अझुरा गइल।।
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बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
रउवा रुठ गइनी तऽ मनाईब कइसे
काम के ना रही दू नमर धन कबो।
लूट के भोज से देह गदरा गइल।।
घाम में आजु बाड़े घमाइल रघु।
घेरि के साँझि बेरा अब बदरा गइल।।