फेरु से कृपा हो जाव,
ओही से गोड़ धरतानी।
फेरु से भइया, एहू बेर,
परधानी हम लड़तानी।
पिछला बेर जीतल रहनी,
घर आपन बनवनी।
टूटही साइकिल रहे हमार,
मारुति कार कसवनी।
झूठ ना बोलब हम,
साँच-साँच कहतानी।
फेरु से भइया, एहू बेर,
परधानी हम लड़तानी।
एह बेर विकास करेम,
गाँव खूब चमकी।
ना कवनो दलाली खाएब,
ना केहू के धमकी।
राक्षस रहनी पहिले,
अब असली रूप देखावतानी।
फेरु से भइया, एहू बेर,
परधानी हम लड़तानी।
चमचा कहता, “पागल बाड़ऽ,
ई कुल बात बतावऽ जनि।
एह तरे त हार जइबऽ,
असली रूप देखावऽ जनि।”
“बीच में तू बोलऽ जनि,
हम आपन बात कहतानी।
हमरा लगे अनुभव बा,
हम परधानी लड़तानी।”
“ए बुरबक, चुप रहऽ,
चुनावी सब जुमला बा।
हमरा से विकास के,
कवन भला तुलना बा?”
“खाली हमरा के जीते दऽ,
तब सब कुछ बतावतानी।
फेरु से भइया, एहू बेर,
परधानी हम लड़तानी।”
मुर्गा, दारू, साड़ी में,
दस लाख लागल बा।
जे हमरा के वोट देहलस,
ऊ सब त पागल बा।
पइसा, साड़ी, दारू से,
खूब वोट बटोरले बानी।
जीतले के बाद अब,
असली रूप देखवले बानी।
जमील, पइसा पर बिकिहऽ मत,
निहोरा हम करतानी।
फेरु से भइया, एहू बेर,
परधानी हम लड़तानी।
जमील मीर जी के रचना में समसामयिक स्वर होला। केतना सुनर रचना लिखले बानी इहाँ के।
आप सभी मान्यवर का आभार