“बुढ़िया” भोजपुरी कहानी – राघवेन्द्र प्रकाश रघु

दू-चार दिन से बड़ा मन चिड़चिड़ाइल रहत रहे, तनी पाकिट ढीला हो गइल रहे से।सुबह-सुबह दरवाजा केहूँ पीटलस… जा के खोलनी त माई दरवाजा...