पुरवइया

मन काहें अकुताइल बा

भीतरे भीतर घवाहिल बा,बात समझ मे आइल बानेह वेह से सब दूर भइलमन काहें अकुताइल बा। चोरन के अब ज़ोर भइल,भीतरे भीतर शोर भइल,मुह गिरा…
मुकेश यादव "भावुक" 2 दिसम्बर 2025 (पब्लिश्ड: 06:40 IST)

भीतरे भीतर घवाहिल बा,
बात समझ मे आइल बा
नेह वेह से सब दूर भइल
मन काहें अकुताइल बा।

चोरन के अब ज़ोर भइल,
भीतरे भीतर शोर भइल,
मुह गिरा के बइठल बाड़,
का मन के चोर धराईल बा?

आके बईठ पास मे हमरी
नज़र चोरा भागेल कगरी
थाती तोहके सब दे देहब,
काहे मुह झुराइल बा ?

अइसन तोहार खिलवना रहे,
बाकी हमार बिछवना रहे,
रात रात भर जागत रहनी,
काहें अब देह पिराइल बा?

इश्क़ विश्क सब बेमानी ह,
कुछ हमरो भी नादानी ह,
‘भावुक’ मन ना बुझे पावे,
कईसन ई प्रीत बन्हाइल बा?

भीतरे भीतर घवाहिल बा,
बात समझ मे आइल बा
नेह वेह से सब दूर भइल
मन काहें अकुताइल बा।

होम कवि सम्मेलन वीडियो शब्दकोश अकाउंट