भीतरे भीतर घवाहिल बा,
बात समझ मे आइल बा
नेह वेह से सब दूर भइल
मन काहें अकुताइल बा।
चोरन के अब ज़ोर भइल,
भीतरे भीतर शोर भइल,
मुह गिरा के बइठल बाड़,
का मन के चोर धराईल बा?
आके बईठ पास मे हमरी
नज़र चोरा भागेल कगरी
थाती तोहके सब दे देहब,
काहे मुह झुराइल बा ?
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फूल के अस्मिता बचावे के
हमहि से प्रेम, हमहि से छुपावे के बा
माटी कवि सम्मेलन के,भोजपुरियन में क्रेज रही
अइसन तोहार खिलवना रहे,
बाकी हमार बिछवना रहे,
रात रात भर जागत रहनी,
काहें अब देह पिराइल बा?
इश्क़ विश्क सब बेमानी ह,
कुछ हमरो भी नादानी ह,
‘भावुक’ मन ना बुझे पावे,
कईसन ई प्रीत बन्हाइल बा?
भीतरे भीतर घवाहिल बा,
बात समझ मे आइल बा
नेह वेह से सब दूर भइल
मन काहें अकुताइल बा।