कइसे ई जिनगीया कटी, कुछु बोल सखी
बस उनुकर सूरतीया देखीं, कुछ बोल सखी..
उनके से गुन कुल बाटे सहूरवा
कुल सिंगार हमार भइल महुरवा
अब केकरा ला सजी धजी, कुछ बोल सखी
कइसे ई जिनगीया कटी, कुछु बोल सखी
बोले कोयलिया बोली, काँव काँव लागे
मन दो काहें पिरितिया से भागे
निरमोही कइसे के कहीं, कुछ बोल सखी
कइसे ई जिनगीया कटी, कुछु बोल सखी
बाटे उम्मीद मोर अइहे सजनवा
जइसे चारे महीना मे बदले महिनवा
पिया ‘भावुक’ के पइया पड़ी, कुछ बोल सखी
कइसे ई जिनगीया कटी, कुछु बोल सखी




