हम का करीं, बुझाते नइखे.
दुःख मुसीबत, जाते नइखे.
दोसरा के छोड़ीं महाराज,
आपन तऽ, सम्हराते नइखे.
खेती कइनी नोकरी कइनी,
कही कुछउ, पोसाते नइखे.
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प्रीति के रीति सबके पता हो गइल
माथे पर गमछा सजावल गइल बा
गीत जिनिगी के गावल ह आपन धरम-जयकांत सिंह ‘जय’
हाल बताई हम केकरा से,
जब क़ेहु, पतियाते नइखे.
कबले माहुर पियत रहीं,
बोलला बिना,ख़ेपाते नइखे
पंच बोलाइ तऽ बाऊर बा,
आ घर में ,फरियाते नइखे.
होखे आपन चाहे वीराना,
बढ़ल क़ेहु के,सोहाते नइखे.