खात-कमात जब इहँवा बाड़अ,
दोसरा के काहे बखानत बाड़अ?
बा खटास जब सरकार से,
देश के काहे नीचा दिखावत बाड़अ?
का तू बनबअ बड़का नेता,
हिन्दू-हिन्दू से लड़ावत बाड़अ?
देश के नास कइके जमापूंजी,
काहे दोसरा के भड़कावत बाड़अ?
रात अन्हरिया बन बहुरूपिया,
हिन्दू-मुसलमान के भरमावत बाड़अ।
डूब मरअ एक चुरुआ पानी में,
खटत किसान के हक मारत बाड़अ।
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नमक-हरामी चरम सीमा पर,
अनका खीर खियावत बाड़अ।
आपन सोहाए ना आँखि तोहरा,
एक से एक नियम निकालत बाड़अ।
सभा-सभा आ कूदत-फानत,
खाली अनकर गुन गावत बाड़अ।
कामे अइहें अपने लोगवा,
जानत फेरु दांत चियारत बाड़अ।
काम करअ कुछ अइसन नेता,
अमर होके नइखअ आइल बाड़अ।
गुन गावे जहँवा जग सगरी,
काहे कुल-खानदान लसारत बाड़अ?