डाह द्वेष बैर एहि, दिवलिये पर जारल जाव।
आईं ना दियरिया, मोहब्बत के बारल जाव।
वीडियो बनावे लोगवा, मोह-दया नाहीं लागे।
घायल के तड़पत छोड़ी, सड़क से लोग भागे।
भेजी अस्पताल ओकर, जिनिगी उबारल जाव।
आईं ना दियरिया, मोहब्बत के बारल जाव।
काबू वैमनस्य कईलस, सभका अकल के।
वर्चस्व में क्रोध देला, अंज़ाम कत्ल के।
जीत में आवेश बा त, सौम्य खातिर हारल जाव।
आईं ना दियरिया, मोहब्बत के बारल जाव।
नाम पर धर्म के जवन, नफ़रती बर्ताव बा।
जातीये क जातीये से, धर्मों मे भेद-भाव बा।
दुराचारी विषमता के, समाज से नकारल जाव।
आईं ना दियरिया, मोहब्बत के बारल जाव।
ज़री अभिमान नाही, खेदला से दरिद्र।
मन रही स्वच्छ तबे, अईहें घरे ईश्वर।
हियरा भीतरिये ‘यश’ अहंकार पहिले मारल जाव।
आईं ना दियरिया, मोहब्बत के बारल जाव।
डाह द्वेष बैर एहि, दिवलिये पर जारल जाव।
आईं ना दियरिया, मोहब्बत के बारल जाव।
✍️ डॉo यशवन्त केशोपुरी
【कवि/गीतकार】
गाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश)