गाँव-घर से लईकन के परिचय करावल करीं,
साल भर में एके बार छुट्टी लेके आवल करीं,
खेत खरिहान आ किसान के देखाएब जब,
सबका से सभे के लगाव होइ आएब जब।
गोतिया,देयाद,हित-नात के चिन्हावल करीं,
साल भर में एके बार छुटी लेके आवल करीं।
धान, गेहूं, मकई आ मरुआ के दाना देखी,
पुरवज के थाती आउर गुजरल जमाना देखी।
गाँवे वाला नदी,नाला पोखरी घुमावल करीं,
साल भर में एके बार छुट्टी लेके आवल करीं।
परब त्योहार जानी, आउर बेवहार जानी,
रिस्ता के मोल कईसन होला संस्कार जानी।
दादा परदादा लोग के कीरति सुनावल करीं,
साल भर में एके बार छुट्टी लेके आवल करीं।
गुल्ली-डंटा,चिका,दोल्हा-पाती देखी खेल जी,
आउर देखी एक दोसरा से कईसन मेल जी।
होली,छठ,चइत वाला गीत सुनी गावल करी,
साल भर में एके बार छुट्टी लेके आवल करीं।
शुद्ध वातावरण मिली कली मूरझाइल खिली,
खांटी दूध-दही खाई देह चिमर होइ सिल्ली।
धीरे-धीरे लईकन के गाँव घर भावल करी,
साल भर में एके बार छुट्टी लेके आवल करीं।