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माथे पर गमछा सजावल गइल बा

माथे पर गमछा सजावल गइल बा,जइसे सवांग के जगावल गइल बा। ​जेठ के दुपहरी में लू से देहि झुलसे,तs माथ के ओहार बनावल गइल बा।…
गणेश नाथ तिवारी "विनायक" 12 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 11:48 IST)

माथे पर गमछा सजावल गइल बा,
जइसे सवांग के जगावल गइल बा।

​जेठ के दुपहरी में लू से देहि झुलसे,
तs माथ के ओहार बनावल गइल बा।

​उठे जब बबूला के बेजोड़ झोंका,
त मुँह के पट्टी से बचावल गइल बा।

​कबो बीँड़ बन के ई माथा पे सोहे,
तs माथा पs बोझा उठावल गइल बा।

​खेतवा में मोटरी में सतुआ बँधाइल,
त फाँस के झोरी बनावल गइल बा।

​चले जब ना पुरवा तs बनि के बेना,
कि खुद के हवा ई खियावल गइल बा।

​कुँआ के जगत पे जो लोटा ना डूबे,
त डोरी के कामो चलावल गइल बा।

​अमवा के टिकोरा जो गिरल बग़इचा,
त खोंइछा बना के उठावल गइल बा।

​सहर के उ टाई के चमक बा फीका,
कि इज्जत के गाँठ लगावल गइल बा।

​’विनायक’ ई माटी के अइसन महक बा,
जेके रोम-रोम में बसावल गइल बा।

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