Categories

सभी भोजपुरी साहित्यभोजपुरी गीतकवितादेखिएभोजपुरी कहानीग़ज़लहिंदी साहित्यमुक्तकभोजपुरी सनीमाई-पत्रिकालघुकथाव्यंग्य

हमहि से प्रेम, हमहि से छुपावे के बा

446 Views • नवम्बर 30, 2025

उनुकर इरादा हमके सतावे के बा,
हमहीं से प्रेम, हमहीं से छुपावे के बा।

कब ले देखब छुप-छुप के चाँद के,
अब चाँद के ही जमीन पर बुलावे के बा।

रोम-रोम में एगो अलगे नशा चढ़ल बा,
इहे खुशबू अब दुनिया में महकावे के बा।

प्रेम के वासना मत बुझीं, ए भाई,
ई बात अब मजनुवन के समझावे के बा।

मोबाइल आ इंटरनेट के एह दौर में भी,
कवनो कबूतर से चिट्ठी पहुँचावे के बा।

मन बना लीं त मंजिल दूर कहाँ बा,
सात समंदर पार भी घर बनावे के बा।

‘भावुक’, जब-जब उनकर याद सताई,
लौट के, एक ना एक दिन त आवे के बा।

Comments