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कविता

आईं गंउवा देखीं हमार

आईं गंउवा देखीं हमार। कटहर बड़हर गाछ गम्हार। खेती-बाड़ी अउर ईनार। गईआ-बाछी घर पिछुआर। बरहम बाबा-काली माई। सती दाई-जोगनी मांई। छठी मईआ-छोटका पूल। बगल में एकरा छोट स्कूल। दर-दलान आ खेत-खलिहान। ईंहवे…
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1 नवम्बर 2026 · 08:58 अपराह्न IST

आईं गंउवा देखीं हमार।
कटहर बड़हर गाछ गम्हार।
खेती-बाड़ी अउर ईनार।
गईआ-बाछी घर पिछुआर।

बरहम बाबा-काली माई।
सती दाई-जोगनी मांई।
छठी मईआ-छोटका पूल।
बगल में एकरा छोट स्कूल।

दर-दलान आ खेत-खलिहान।
ईंहवे होखे सांझ-बिहान ।
कुछ दूरी पर मोड़-बाजार ।
लगे शनिचर भीड़ अपार।

वातावरण सुखद हरियाली।
फल से लदरल डाली-डाली।
ठण्ढी हवा बहे सुखदाई।
उठीं सबेरे देखीं भाई।

कोयल कूके चिरई बोले।
कनवा में ज्यूं मिसिरी घोलें।
प्रात बेला में जगे किसान ।
मेहनत से उपजावे धान।

गेहूं, रागी, गन्ना, छोला।
दलहन अलसी इहवें होला।
आंख उठा के देखीं कतहीं।
जड़ी – बूटी ह पतई – पतई।

गांव कीमती हमर बड़ा बा।
एहि प मानी देश खड़ा बा।
गांव पूरा लागे परिवार ।
सरग से सुन्दर ‘गांव हमार’।

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