परती खेत बोआए लागल।
पानी खाद दियाए लागल।
चाम झूल के बाहरी आइल,
जिनगी अब ओराए लागल।
बाप भइल बा बुढ़वा जबसे,
बाबू के गोड़ पिराए लागल।
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दिल कइसे तोहसे हम लगाईं, दिल चुरा लिहलस केहू
अब त दूरे से, राम-राम होता इहाँ
धूप चटके त अमृत के निसानी चाहीं
घर के चूल्हा ठंठा भइल,
धुआँ आँख समाए लागल।
जेकरे हाथ में छाला पड़ल,
ओकरे हाथ कटाए लागल।
कलम भइल सरकारी जबसे,
मुद्दा कुल हेराए लागल।
आँगन में अब चुप्पी बोले,
‘भावुक’ मन मुरझाए लागल।