अब त दूरे से, राम-राम होता इहाँ
गजल जिंदगी के सुनावत बा अइसे,
लुटा गइल, लोर बहावत बा अइसे।
अब त दूरे से, राम-राम होता इहाँ,
कहाँ अब, कोई बोलवात बा अइसे।
जाके कटा जाला, लोग ट्रेन के नीचे,
गम के शराब में गँवावत बा अइसे।
उजर से करिया देंह भइल जाता,
जिनगी में आग लगावत बा अइसे।
भरोसा हम कइलीं जेकरा पे जेयादा,
उहे अब त आँखि देखावत बा अइसे।
बदलीं कइसे हम तकदीर के अपना,
समय हमके अइसन नचावत बा अइसे।
‘भावुक’ छुपा के जख्म सीना के भीतरी,
जमाना के हँसि के देखावत बा अइसे।
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