धूप चटके त अमृत के निसानी चाहीं,
सोन्ह घइला के ओही में पानी चाहीं।
जवन मिसरी घोल देला मन के भीतर,
ओही सतुआ के सानल कहानी चाहीं।
मेटावे घाम के तीताई जलन देहि से,
पिपरा के छाँव अस एगो जवानी चाहीं।
चना,जव मकई के सुनर महक आवेला
ओपर नून,मिर्चा टिकोरा छानी चाहीं।
मिटे कंठ के तरास जव-बूट के सतुआ से,
अपना गाँव के किसान के मेहरबानी चाहीं।
जेकरा पवला से पुरखा के याद आवेला
‘बिनायक’ आज ओइसन रूहानी चाहीं।
गणेश नाथ तिवारी”विनायक”