पुरवइया

धूप चटके त अमृत के निसानी चाहीं

धूप चटके त अमृत के निसानी चाहीं,सोन्ह घइला के ओही में पानी चाहीं। ​जवन मिसरी घोल देला मन के भीतर,ओही सतुआ के सानल कहानी चाहीं।…
गणेश नाथ तिवारी "विनायक" 14 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 11:32 IST)

धूप चटके त अमृत के निसानी चाहीं,
सोन्ह घइला के ओही में पानी चाहीं।

​जवन मिसरी घोल देला मन के भीतर,
ओही सतुआ के सानल कहानी चाहीं।

​मेटावे घाम के तीताई जलन देहि से,
पिपरा के छाँव अस एगो जवानी चाहीं।

​चना,जव मकई के सुनर महक आवेला
ओपर नून,मिर्चा टिकोरा छानी चाहीं।

मिटे कंठ के तरास जव-बूट के सतुआ से,
अपना गाँव के किसान के मेहरबानी चाहीं।

​जेकरा पवला से पुरखा के याद आवेला
‘बिनायक’ आज ओइसन रूहानी चाहीं।

गणेश नाथ तिवारी”विनायक”

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