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चिरई बड़ा जुलुम तु कइलू….भोजपुरी कहानी

रोज का तरे ओहू दिन इसकूल में पहुँचि के दस बरिस के मुनिया आपन सहेली लोगन के खुशखबरी देवे के ना भुलाइलि । ओइसे तऽ…
श्लेष अलंकार 7 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 03:40 IST)
ई तस्वीर एआई से बनवाल गईल बा

रोज का तरे ओहू दिन इसकूल में पहुँचि के दस बरिस के मुनिया आपन सहेली लोगन के खुशखबरी देवे के ना भुलाइलि । ओइसे तऽ मुनिया के इसकूली नाम प्रेरणा हऽ बकिर घर में आ हित-नात के बीच इनकरा के लोग मुनिएँ बोलेला । मुनिया भिर रोज कऊनों न कऊनो खुशखबरी रहेला । जइसे आज हमरे बालकनी में एगो खूब सुन्नर उज्जर रंग के कबूतर आइल रहे या काल्हि हमरा छत पे एगो लाल रंग के सुग्गा आइल रहे । बकिर आज के खुशखबरी कुछ खास रहे मुनिया हँस-हँस के अपने एगो हमउम्र लइकी कृति के बतावत रहे- ” जानती हो कृति न्अ…हमारे बालकनी के रोशनदान पर एक चिड़िया ने अपना घोंसला बनाया है और उसमें उसके दो प्यारे-प्यारे नन्हें बच्चे भी हैं । ”

” सचमुच यार ।”
” और नहीं तो क्या…? मैं झूठ बोलती हूँ । ”

” अरे नहीं यार…फिर मुझे कब ले चलेगी अपने घर । बड़े प्यारे लगते होंगे वे नन्हें-नन्हें बच्चे । ”
एक शर्त पर ले चलूँगी… तू मेरे लिए कैडबरी वाला चाकलेट लाएगी । ”
ठीक है बाबा मैं तेरे लिए कैडबरी वाला चाकलेट लाऊंगी ।

” पक्का ”
” हाँ पक्का ।”

तबे इसकूल के घंटी टन-टन बाजे लागेल आ लरिकन आपन-आपन कक्षा में जा के बइठि गइलें । मास्टर लोग आ गइल अऊर पढ़ाई शुरु। नियमित पढ़ाई के बाद छुट्टी भइला प मुनिया के घरे जाए के बड़ी जल्दी रहे, काहे से कि ओकर आँखि में ऊ चिरई के छोट-छोट गेदा-गेदी बेरि-बेरि लऊकत रहले । घरे चहुँपते मुनिया बस्ता फेंकि के बालकनी में आ गइलि अऊर खोता के निहारे लागलि । ऊ तनिक देर तक कऊनो आहट न पाके मायूस हो गइलि । आ मम्मी से पूँछे लागलि- ” मम्मी-मम्मी, ई चिरई कहाँ गइल, एकर बच्चा लोग बोलत काहे नइखन ।”
अरे बेटा पहिले एहर अइबू , कपड़ा बदल के खाना-पानी खइबू कि चिरई के पीछे पड़ल रहबू… ओकरा भूख ना लागेला? ऊँहो खाना-पानी खाए कहईं गइल होई । ”

“ओकरा भूख लागेला आ ओकर लरिकन के भूख न लागेला…?”
काहे न लागेला…पहिले ई बतावा तोहरा के खाना खियवले बिना हम खाना खाइला? ”
” ना…बिल्कुल ना ।”

” तब…! ऊहो अपने लइका लोगन के पहिले दाना चुगा के फिर भोजन के तलाश में निकल गइल बिआ।”
” अच्छा मम्मी ई बतावा ऊ बच्चा लोग बोलत काहे नाहीं बाड़े? ”

अबहीं ऊ लोग आराम से सूतल बाड़े । अब्बै चिरई जब आई तऽ बोलिहें सन् । अब तू खाना खा लऽ। ”
” ना मम्मी ना, हम खाना ना खाएब जब तक ले चिरई ना आ जाई हम इहवें इंतजार करबि । ”

थोड़ी देर में मम्मी कोऊनो काम में लागि गइली आ मुनिया उहवें बइठि के फिर खोता निहारे लागलि। कुछ देर बाद सचमुच चिरई आ गइल , आ ओकरा अऊते बच्चा लोग चू…चू…चू कइके खोता के बहरा झाके लगलन । मुनिया के खुशी के ठिकाना न रहल । मुनिया मने-मन अपने-आप के ओहि चिरई के बच्चन के जगह देखे लागलि ।

दिन गुजरे लागल मुनिया के रोज के इहे दिनचर्या रहे । इस्कूल से अइला के बाद जबतक ऊ चिड़िया के बच्चा लोगन के देखि ना लेवे, खाना ना खाए ।
ऊ अपना मुहल्ला के आ इसकूल के तकरीबन सब सहेलिन के चिरई से मिलवा चुकल रहली । धीरे-धीरे दीपावली नियरात रहे लोगन के घर में साफ-सफाई आ रंग रोगन के काम जोर पकड़त रहे । मुनिया के घर में भी चर्चा होखे लागल । मुनिया के मम्मी के मन त न रहे बकिर पापा चाहत रहलें कि ढेर दिन भइल घर के रंग-रोगन भइले असों ई काम होइ जास त ठीक रही। लइका लोग दीवार के एकदम गंदा क दिहले बाड़न । फिर का पूछे के रहल , दूसरा दिन दूगो आदमी घर में बाल्टी , ब्रश आ सीढ़ी ले के लाघ गइलन । एक हफ्ता काम भइला के बाद भितरी के पेंट के काम लगभग समाप्त हो गइल रहे, आज बहरी के दीवार अऊर बालकनी के लमर रहे ।

रोज का तरे आजो मुनिया इसकूल गइल रही बकिर आज उनकर मन पढ़ाई में ना लगत रहे । रहि-रहि के उनुका चिरई के इयाद आवत रहे । छुट्टी के घंटी लगते मुनिया सरपट घरे चहुँपि गइली। दरवाजा खुलते बस्ता फेंकि के सीधा बालकनी में दाखिल हो गइली । एकाएक बालकनी से बहुत दर्दनाक चीख सुनाई पड़े लागल । चीख सुनिके मम्मी दौड़ि के आ गइली।

” का भइल ए बेटा, काहे रोवऽताडू…चोट लागल हऽ , गिर गइलू? का भइल बतावऽ ना…?”

मुनिया पैर पटकि-पटकि के चिल्लात रहलि। बस एक बेरि रोशनदान का ओरि इशारा कइलसि- ” मम्मी…! ” चिरई के खोता का भइल?”
मम्मी के आँखि में छलछल लोर रहे। ऊ मुनिया के गोदी से चिपका लिहली अऊर एतने कहि पइली-
” चिरई बड़ा जुलुम तू कइलू…
घर में खोता लगवलू ना । “

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