माटी कवि सम्मेलन

करिके गवनवा, भवनवा में छोडि कर

भिखारी ठाकुर

08 अप्रैल, 2026

करिके गवनवा, भवनवा में छोडि कर, अपने परईलन पुरूबवा बलमुआ।
अंखिया से दिन भर, गिरे लोर ढर ढर, बटिया जोहत दिन बितेला बलमुआ।


गुलमा के नतिया, आवेला जब रतिया, तिल भर कल नाही परेला बलमुआ।
का कईनी चूकवा, कि छोडल मुलुकवा, कहल ना दिलवा के हलिया बलमुआ।


सांवली सुरतिया, सालत बाटे छतिया, में एको नाही पतिया भेजवल बलमुआ।
घर में अकेले बानी, ईश्वरजी राख पानी, चढ़ल जवानी माटी मिलेला बलमुआ।


ताक तानी चारू ओर, पिया आके कर सोर, लवटो अभागिन के भगिया बलमुआ।
कहत ‘भिखारी’ नाई, आस नइखे एको पाई, हमरा से होखे के दीदार हो बलमुआ।

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भिखारी ठाकुर

"भोजपुरी भाषा के एक भारतीय कवि, नाटककार, गीतकार, अभिनेता, लोक नर्तक , लोक गायक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्हें भोजपुरी भाषा के महानतम लेखकों में से एक और पूर्वांचल और बिहार के सबसे लोकप्रिय लोक लेखक के रूप में व्यापक रूप से माना जाता है।"

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