का कही ए भाई आज, कईसे हम ईद मनवनी ह,
ईदगाह में सैकड़ों भीड़ रहल ह, बाकिर खुद के तनहा पवनी ह।
मने-मने सकुचात रहनी ह, कईसे हाथ बढ़ाईं,
कैसे करीं मुसाफ़ा हम, केकरा से हाथ मिलाईं।
ईद परदेसी के अइसहीं होला, मन के हम समझवनी ह,
का कही ए भाई आज, कईसे हम ईद मनवनी ह।
फिर अउते ईदगाह से हम, माई के फोन लगवनी ह,
दुआ-सलाम भईल ह, सब ठीके बाटे बतवनी ह।
क बजे नमाज भईल ह, कब पढ़ के अईला ह?
पूछली ह माई—”ए बाबू! का बनवला ह, का खइला ह?”
कवनो बात के कमी नईखे, चिंता मत कर माई रे,
तोहरे हाथ के स्वाद सेवई में, इहवाँ कहाँ भेटाई रे!
आँख भईल ह नम माई के, कईसहूँ ओके समझवनी ह,
का कही ए भाई आज, कईसे हम ईद मनवनी ह।