रोपनी, सोहनी नीमन से कईले रहले,
अच्छा उपज के आस लगइले रहले।
अब उनका बुझाता सब वीरान भइले,
एहू साल फेरू दुखी किसान भइले।
का भगवान! ई का कईनी?
सगरी फसल के नुकसान कईनी।
काहे ना किसान भाई लोग के,
खुशी में सहारा बनईनी?
खेती कईले रहले उधारी-ब्याज से,
असो गदगद रहले धान-अनाज से।
अब चकनाचूर समूचा अरमान भइले,
एहू साल फेरू दुखी किसान भइले।
अबकी के त नीमन रहे धान,
सबके रहे खेती पर गुमान।
अइसन काहे कईनी भगवान,
भेज के ई अर्नब तूफान।
सब ओर लागत बा सुनसान,
टूट गइल किसान के अरमान।
केतनन के पसई खेत में पड़ल बा काट के,
खेतिहर भइल बाड़े घर के ना घाट के।
मेहनत के फल पर पानी फिर गइल,
किसान के चेहरा से मुस्कान छिन गइल।
अब रहत बा लोग दुख के सितम में,
अन्नदाता निराश बा हर मौसम में।
धनंजय, कर्जा कईसे भराई,
एही सोच में परेशान भइलें,
एहू साल फेरू दुखी किसान भइलें।