माटी कवि सम्मेलन

मन के मार के जियल भी मुश्किल

प्रकाशित: 10 अप्रैल, 2026

मन के मार के जियल भी मुश्किल
मन के माफिक़ भी दुश्वारी
बनल बा दुश्मन, दुनियादारी

एक ओर परिवार के चिंता
एक ओर घर – बार के चिंता
हितई – नतई मान – प्रतिष्ठा
रोज़ी औ – रोजगार के चिंता
चैता – चईती फगुआ गुड़िया
तिथि तीज- त्यौहार के चिंता
यार के चिंता, प्यार के चिंता
एह सारा संसार के चिंता

सब एक साथे साधी कईसे
एक सूत में बांधी कईसे
बर के बर्बस करी बरारी

कबों ठहर के सोचिला जब
डर के डरे सिहर जाईला
छन भर खातिर जम जाला तन
छन भर खातिर मर जाईला
फिर भी हार ना मनले बानी
जीते के ज़िद ठनले बानी
साँस-साँस पे आस जगा के
जीवन राह पकड़ले बानी

बाक़ी बा सब राम भरोसे
राम जी दिहले राम ही सोचें
अब उनुकर ही बाटे बारी

कठिन शब्द अउर अर्थ

  • फगुआ: होली।
  • जग: यज्ञ।

राम अचल पटेल

होम रचनाकार वीडियो शब्द-कोश ई-पेपर