बाड़ऽ परदेस पिया, अकेले हम बानी,
दू गो बचवन के लेके जिनगी ढोवत बानी।
रात भर जागीं, तोहार फोटो निरेखत बानी,
अँखियन में लोर लेके करवट फेरत बानी।
पूछेला बबुआ हमसे, “माई, बाबू कब अइहें?”
दुलरा के हँसी-हँसी, रोज झूठो फुसलावत बानी।
चूल्हा-चौका, खेत-बधार सब हमही देखीं,
तोहरा कमी में, रजऊ! खुदे मरद बनल बानी।
हित-नात सभे केहू हँसेला, बात बनावेला,
“रखले बा सवतिया बहरा” – सबके ताना सुनत बानी।
कुछ अइसन काम करीं, मुँह सबकर बंद होखे जी,
फोनवा पर का बताईं, कइसे-कइसे हम सहत बानी।
बात मान लीं हमरो, तनी लाज राखीं रउआ जी,
आवे-जावे के छुट्टी ले लीं, मजबूरी हम समझत बानी।
हमरो के बहरा ना त साथे ले के चलीं जी,
खुश रहीहें सभे लइका-बुतरू, जुड़ाइल रही तन-मन जी।